सोम से प्रभु प्राप्ति व नीरोगता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अध्वर्यो) = हे यज्ञशील पुरुष ! अहिंसात्मक कर्मों में प्रवृत्त होनेवाले पुरुष, (सुतं सोमम्) = शरीर में उत्पन्न हुए हुए सोम को (अद्रिभिः) = उपासनाओं के द्वारा (पवित्रे) = पवित्र हृदय में (आसृज) = सर्वथा संसृष्ट कर । तू हृदय को पवित्र बना और इस प्रकार सोम का शरीर में ही रक्षण करनेवाला बन । [२] (पुनीहि) = इस सोम को तू सर्वथा पवित्र कर। इसमें वासनाओं के उबाल को मत पैदा होने दे। वासनाओं से मलिन हुआ हुआ सोम शरीर में सुरक्षित नहीं रह सकता। यह पवित्र सोम (इन्द्राय) = प्रभु प्राप्ति के लिये होता है। और पातवे शरीर के रक्षण के लिये होता है। इस सोम के द्वारा शरीर में रोगकृमियों का संहार होकर नीरोगता प्राप्त होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु की उपासना द्वारा हृदय को पवित्र बनाकर हम सोम का रक्षण करते हैं । यह हमें नीरोग बनाता है और प्रभु प्राप्ति का पात्र बनाता है।