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अध्व॑र्यो॒ अद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज । पु॒नी॒हीन्द्रा॑य॒ पात॑वे ॥

English Transliteration

adhvaryo adribhiḥ sutaṁ somam pavitra ā sṛja | punīhīndrāya pātave ||

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Pad Path

अध्व॑र्यो॒ इति॑ । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तम् । सोम॑म् । प॒वित्रे॑ । आ । सृ॒ज॒ । पु॒नी॒हि । इन्द्रा॑य । पात॑वे ॥ ९.५१.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:51» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:8» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:2» Mantra:1


ARYAMUNI

अब सौम्यस्वभाव के उत्पादन का वर्णन करते हैं।

Word-Meaning: - (अध्वर्यो) हे अध्वर्यु लोगों ! (सोमम्) परमात्मा को (अद्रिभिः सुतः) अपनी इन्द्रियों द्वारा ज्ञान का विषय (सृज) करिये (इन्द्राय पातवे) और जीवात्मा की तृप्ति के लिये (पवित्रे पुनीहि) अपने अन्तःकरण को पवित्र करिये ॥१॥
Connotation: - परमात्मा की प्राप्ति के लिए अन्तःकरण का पवित्र होना अत्यावश्यक है, इसलिए प्रत्येक जिज्ञासु को चाहिये कि पहले अपने अन्तःकरण को पवित्र करे ॥१॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सोम से प्रभु प्राप्ति व नीरोगता

Word-Meaning: - [१] (अध्वर्यो) = हे यज्ञशील पुरुष ! अहिंसात्मक कर्मों में प्रवृत्त होनेवाले पुरुष, (सुतं सोमम्) = शरीर में उत्पन्न हुए हुए सोम को (अद्रिभिः) = उपासनाओं के द्वारा (पवित्रे) = पवित्र हृदय में (आसृज) = सर्वथा संसृष्ट कर । तू हृदय को पवित्र बना और इस प्रकार सोम का शरीर में ही रक्षण करनेवाला बन । [२] (पुनीहि) = इस सोम को तू सर्वथा पवित्र कर। इसमें वासनाओं के उबाल को मत पैदा होने दे। वासनाओं से मलिन हुआ हुआ सोम शरीर में सुरक्षित नहीं रह सकता। यह पवित्र सोम (इन्द्राय) = प्रभु प्राप्ति के लिये होता है। और पातवे शरीर के रक्षण के लिये होता है। इस सोम के द्वारा शरीर में रोगकृमियों का संहार होकर नीरोगता प्राप्त होती है।
Connotation: - भावार्थ - प्रभु की उपासना द्वारा हृदय को पवित्र बनाकर हम सोम का रक्षण करते हैं । यह हमें नीरोग बनाता है और प्रभु प्राप्ति का पात्र बनाता है।

ARYAMUNI

अथ सौम्यस्वभावोत्पादनं वर्ण्यते।

Word-Meaning: - (अध्वर्यो) हे अध्वर्युगणाः ! (सोमम्) परमात्मानं (अद्रिभिः सुतः) स्वेन्द्रियद्वारेण ज्ञानविषयं (सृज) कुर्वन्तु (इन्द्राय पातवे) जीवात्मतर्पणाय (पवित्रे पुनीहि) स्वकीयमन्तःकरणं पवित्रं कुर्वन्तु ॥१॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O high priest of soma yajna, create the awareness of Soma, spirit of purity and divinity collected and concentrated by the senses and mind in the heart, and sanctify and intensify it there for exhilaration of the soul.