यो यजा॑ति॒ यजा॑त॒ इत्सु॒नव॑च्च॒ पचा॑ति च । ब्र॒ह्मेदिन्द्र॑स्य चाकनत् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
yo yajāti yajāta it sunavac ca pacāti ca | brahmed indrasya cākanat ||
पद पाठ
यः । यजा॑ति । यजा॑ते । इत् । सु॒नव॑त् । च॒ । पचा॑ति । च॒ । ब्र॒ह्मा । इत् । इन्द्र॑स्य । चा॒क॒न॒त् ॥ ८.३१.१
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:31» मन्त्र:1
| अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:38» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:1
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यज्ञ के लाभ
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (यजाति) = एक बार यज्ञ करता है, वह (यजाते इत्) = फिर अवश्य यज्ञ करता ही है। यज्ञ से देखे गये लाभ उसे यज्ञ की रुचिवाला बना देते हैं। [२] यह अपने जीवन में (सुनवत्) = सोम का अभिषव करता है, वीर्य शक्ति का सम्पादन करता है, (च) = और (पचाति च) = अवश्य ही वेद के आदेश के अनुसार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान के भोजन का परिपाक करता है। यह (इन्द्रस्य) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु के (ब्रह्म इत्) = इस वेदज्ञान को ही, इन वेदवाणियों के द्वारा स्तवन को ही (चाकनत्) = चाहता है। इसे स्वाध्याय व स्तवन ही रुचिकर होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञ करने से यज्ञ फलों के दृष्टिगोचर होने पर मनुष्य यज्ञशील ही बन जाता है। यह अपने अन्दर सोम शक्ति का सम्पादन करता है, ज्ञान के भोजन का परिपाक करता है, प्रभु के वेदज्ञान को अपनाता हुआ उन वेदवाणियों से प्रभु का स्तवन करता है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The yajamana who performs yajna himself or has yajna performed by a priest, presses and prepares the soma himself or has it prepared through a priest pleases Indra and obtains the knowledge of Divinity and Veda.
