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दे॒वं नरः॑ सवि॒तारं॒ विप्रा॑ य॒ज्ञैः सु॑वृ॒क्तिभिः॑। न॒म॒स्यन्ति॑ धि॒येषि॒ताः॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

devaṁ naraḥ savitāraṁ viprā yajñaiḥ suvṛktibhiḥ | namasyanti dhiyeṣitāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दे॒वम्। नरः॑। स॒वि॒तार॑म्। विप्राः॑। य॒ज्ञैः। सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑। न॒म॒स्यन्ति॑। धि॒या। इ॒षि॒ताः॥

ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:62» मन्त्र:12 | अष्टक:3» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:3» अनुवाक:5» मन्त्र:12


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - जो (धिया) बुद्धि वा कर्म से (इषिताः) प्रेरणा किये गये (नरः) योग से इन्द्रिय और अन्तःकरण के प्राप्त करानेवाले (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (सुवृक्तिभिः) उत्तम प्रकार दोषों का काटना जिनमें उन (यज्ञैः) शास्त्र का अभ्यास सत्सङ्ग और योगाभ्यासों से (सवितारम्) सम्पूर्ण संसार के उत्पन्न करने और (देवम्) सुख देनेवाले को (नमस्यन्ति) नमस्कार करते हैं, वे अभीष्टसुखों से सम्पन्न होते हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जो इन्द्रियों को वश में करनेवाले विद्वान् लोग प्रेम और सत्यभाषणादिस्वरूप धर्म से परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे सुख से युक्त होते हैं ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'नर, विप्र व धियेषित' बनना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नरः) = यज्ञादि उत्तम कर्मों का प्रणयन करनेवाले, (विप्राः) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले, (धिया इषिता:) = बुद्धि से प्रेरित होनेवाले, अर्थात् सब कार्यों को बुद्धिपूर्वक करनेवाले लोग सवितारं देवम्- उस प्रेरक प्रकाशमय प्रभु को (यज्ञैः) = यज्ञों से, लोकहित के लिए किये गये कर्मों से तथा (सुवृक्तिभिः) = उत्तमता से-पापवर्जन द्वारा (नमस्यन्ति) = पूजते हैं। [२] प्रभु के उपासक [क] 'नर' होते हैं-यज्ञादि उत्तम कर्मों का प्रणयन करनेवाले, [ख] ये 'विप्र' होते हैं अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले-न्यूनताओं को दूर करनेवाले [ग] (धियेषिताः) = बुद्धि से प्रेरित होनेवालेबुद्धिपूर्वक कार्यों को करनेवाले। [३] ये प्रभु के उपासक प्रभु की उपासना 'यज्ञों' व 'सुवृक्तियों' द्वारा करते हैं। यज्ञादि उत्तम कर्मों का करना ही प्रभु की उपासना है। 'सुवृक्ति' अर्थात् अच्छी प्रकार पापवर्जन से प्रभु की उपासना होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञों व पापवर्जन द्वारा प्रभु का उपासन करते हुए आगे बढ़ें, अपनी न्यूनताओं को दूर करें और बुद्धिपूर्वक कर्मों को करें।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

ये धियेषिता नरो विप्राः सुवृक्तिभिर्यज्ञैः सवितारं देवं नमस्यन्ति तेऽभीष्टसिद्धसुखा जायन्ते ॥१२॥

पदार्थान्वयभाषाः - (देवम्) सुखस्य दातारम् (नरः) योगेनेन्द्रियान्तःकरणस्य नेतारः (सवितारम्) सकलजगदुत्पादकम् (विप्राः) मेधाविनः (यज्ञैः) शास्त्राऽभ्याससत्सङ्गयोगाभ्यासैः (सुवृक्तिभिः) सुष्ठु वृक्तिर्दोषाणां छेदनं येषु तैः (नमस्यन्ति) (धिया) प्रज्ञया कर्मणा वा (इषिताः) प्रेरिताः ॥१२॥
भावार्थभाषाः - ये संयमिनो विद्वांसः प्रेम्णा सत्यभाषणादिलक्षणेन धर्म्येण परमेश्वरमुपासते ते सुखाढ्या जायन्ते ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Men of piety, knowledge and intelligence, inspired with will and light divine, who control and direct their mind and sense, bow to generous and self- refulgent Savita in meditation, adore him with songs of ecstasy and offer him thanks and homage with yajnas and self-sacrifice.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

More about God is stated

अन्वय:

The devout and wise men have attained mastery over their inner and external senses through the practice of Yoga. Impelled by intellect and good actions, they adore God, Who is the giver of true happiness and Creator of the world. They do so by the study of the Shastras (holy scriptures), association with the nobles, practice of Yoga and the eradication of all evils. They thus attain all desirable happiness.

भावार्थभाषाः - The learned persons of self-control adore God with love (devotion) and righteousness consisting of truthfulness and other virtues. They attain delight in abundance.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - संयमी विद्वान लोक प्रेम व सत्यभाषण यांनी युक्त बनून धर्माने परमेश्वराची उपासना करतात ते सुखी होतात. ॥ १२ ॥