असृ॑ग्रमिन्द्र ते॒ गिरः॒ प्रति॒ त्वामुद॑हासत। अजो॑षा वृष॒भं पति॑म्॥
asṛgram indra te giraḥ prati tvām ud ahāsata | ajoṣā vṛṣabham patim ||
असृ॑ग्रम्। इ॒न्द्र॒। ते॒। गिरः॑। प्रति॑। त्वाम्। उद्। अ॒हा॒स॒त॒। अजो॑षाः। वृ॒ष॒भम्। पति॑म्॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर भी अगले मन्त्र में ईश्वर का प्रकाश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वृषभ - पति [वर्षक - पालक]
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्सोऽर्थ उपदिश्यते।
हे इन्द्र परमेश्वर ! यास्ते तव गिरो वृषभं पतिं त्वामुदहासत यास्त्वमजोषाः सर्वा विद्या जुषसे ताभिरहमपि प्रतीत्थंभूतं वृषभं पतिं त्वामसृग्रं सृजामि॥४॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The same subject is taught again.
O God, The Vedic Speeches revealed by The manifest or reveal Thee well who art our Protector-, Showerer of Peace and Bliss. Thou art full of all knowledge, therefore I also glorify Thee who art our Protector and Rainer of blessings.
