पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (इह) इस [पतिकुल] में (ते) तेरा (प्रियम्) हित (प्रजायै) प्रजा [सन्तान, सेवक आदि] केलिये (सम्) अच्छे प्रकार (ऋध्यताम्) बढ़े, (अस्मिन् गृहे) इस घर में (गार्हपत्याय) गृहपत्नी के कार्य के लिये (जागृहि) तू जागती रह [सावधान रह]। (एना पत्या) इस पति के साथ (तन्वम्) श्रद्धा को (सं स्पृशस्व) संयुक्त कर, (अथ)और (जिर्विः) स्तुतियोग्य तू (विदथम्) सभागृह में (आ वदासि) बातचीत कर ॥२१॥
भावार्थभाषाः - वधू को योग्य है किपतिकुल में पहुँचकर प्रसन्नचित्त होकर सन्तान, सेवक आदि का यथावत् पालन करके घरके कामों में सावधान रहे, और पति से भक्ति करके संसार में कीर्ति बढ़ावे ॥२१॥यहमन्त्र कुछ भेद से महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में उद्धृतहै−घर पहुँचकर वधूको रथ से उतारना आदि कर्म करके वर इस मन्त्र को बोलकर वधू कोसभामण्डल में ले जावे ॥२१॥