Go To Mantra
Viewed 61 times

इ॒ह प्रि॒यंप्र॒जायै॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जागृहि। ए॒ना पत्या॑त॒न्वं सं स्पृ॑श॒स्वाथ॒ जिर्वि॑र्वि॒दथ॒मा व॑दासि ॥

Mantra Audio
Pad Path

इह । प्रियम् । प्रऽजायै । ते । सम् । ऋध्यताम् । अस्मिन् । गृहे । गार्हऽपत्याय । जागृह‍ि । एना । पत्या । तन्वम् । सम् । स्पृशस्व । अथ । जिर्वि: । विदथम् । आ । वदासि ।१.२१॥

Atharvaveda » Kand:14» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:21


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विवाह संस्कार का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे वधू !] (इह) इस [पतिकुल] में (ते) तेरा (प्रियम्) हित (प्रजायै) प्रजा [सन्तान, सेवक आदि] केलिये (सम्) अच्छे प्रकार (ऋध्यताम्) बढ़े, (अस्मिन् गृहे) इस घर में (गार्हपत्याय) गृहपत्नी के कार्य के लिये (जागृहि) तू जागती रह [सावधान रह]। (एना पत्या) इस पति के साथ (तन्वम्) श्रद्धा को (सं स्पृशस्व) संयुक्त कर, (अथ)और (जिर्विः) स्तुतियोग्य तू (विदथम्) सभागृह में (आ वदासि) बातचीत कर ॥२१॥
Connotation: - वधू को योग्य है किपतिकुल में पहुँचकर प्रसन्नचित्त होकर सन्तान, सेवक आदि का यथावत् पालन करके घरके कामों में सावधान रहे, और पति से भक्ति करके संसार में कीर्ति बढ़ावे ॥२१॥यहमन्त्र कुछ भेद से महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में उद्धृतहै−घर पहुँचकर वधूको रथ से उतारना आदि कर्म करके वर इस मन्त्र को बोलकर वधू कोसभामण्डल में ले जावे ॥२१॥
Footnote: २१−(इह) अत्र पतिकुले (प्रियम्) हितम् (प्रजायै)सन्तानसेवकादिपालनाय (ते) तव (सम्) सम्यक् (ऋध्यताम्) वर्धताम् (अस्मिन्) (गृहे) (गार्हपत्याय) गृहपत्नीकर्तव्यसिद्धये (जागृहि) बुध्यस्व। सावधाना भव (एना) अनेन (पत्या) स्वामिना सह (तन्वम्) तन उपकारे श्रद्धायां च-ऊ। श्रद्धां भक्तिम् (संस्पृशस्व) संयोजय (अथ) अनन्तरम् (जिर्विः) अ० ८।१।६। जॄ स्तुतौ-क्विन् ह्रस्वः, जरा स्तुतिर्जरतेः स्तुतिकर्मणः-निरु० १०।८। जीर्विः। स्तुत्या। अन्यद् गतम्-म०२०॥