यन्त्री॒ राड् य॒न्त्र्य᳖सि॒ यम॑नी ध्रु॒वासि॒ धरि॑त्री। इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ र॒य्यै त्वा॒ पोषा॑य त्वा ॥२२ ॥
यन्त्री॑। राट्। य॒न्त्री। अ॒सि॒। यम॑नी। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। धरि॑त्री। इ॒षे। त्वा॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। र॒य्यै। त्वा॒। पोषा॑य। त्वा॒ ॥२२ ॥
हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर स्त्री कैसी होवे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनः पत्नी कीदृशी स्यादित्याह ॥
(यन्त्री) यन्त्रवत् स्थिता (राट्) प्रकाशमाना (यन्त्री) यन्त्रनिमित्ता (असि) (यमनी) आकर्षणेन नियन्तुं शीला आकाशवद् दृढा (ध्रुवा) (असि) (धरित्री) सर्वेषां धारिका (इषे) इच्छासिद्धये (त्वा) त्वाम् (ऊर्जे) पराक्रमप्राप्तये (त्वा) त्वाम् (रय्यै) लक्ष्म्यै (त्वा) त्वाम् (पोषाय) (त्वा) त्वाम्। [अयं मन्त्रः शत०८.३.४.१० व्याख्यातः] ॥२२ ॥
