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अषा॑ढासि॒ सह॑माना॒ सह॒स्वारा॑तीः॒ सह॑स्व पृतनाय॒तः। स॒हस्र॑वीर्य्यासि॒ सा मा॑ जिन्व ॥२६ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अषा॑ढा। अ॒सि॒। सह॑माना। सह॑स्व। अरा॑तीः। सह॑स्व। पृ॒त॒ना॒य॒त इति॑ पृतनाऽय॒तः। स॒हस्र॑वी॒र्य्येति॑ स॒हस्र॑ऽवीर्य्या। अ॒सि॒। सा। मा॒। जि॒न्व॒ ॥२६ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:13» मन्त्र:26


हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वह कैसी हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे पत्नी ! जो तू (अषाढा) शत्रु के असहने योग्य (असि) है, तू (सहमाना) पति आदि का सहन करती हुई अपने पति के उपदेश को (सहस्व) सहन कर, जो तू (सहस्रवीर्य्या) असंख्यात प्रकार के पराक्रमों से युक्त (असि) है, (सा) सो तू (पृतनायतः) अपने आप सेना से युद्ध की इच्छा करते हुए (अरातीः) शत्रुओं को (सहस्व) सहन कर और जैसे मैं तुझ को प्रसन्न रखता हूँ, वैसे (मा) मुझ पति को (जिन्व) तृप्त किया कर ॥२६ ॥
भावार्थभाषाः - जो बहुत काल तक ब्रह्मचर्य्याश्रम से सेवन की हुई, अत्यन्त बलवान् जितेन्द्रिय वसन्त आदि ऋतुओं के पृथक्-पृथक् काम जानने, पति के अपराध को क्षमा और शत्रुओं का निवारण करनेवाली, उत्तम पराक्रम से युक्त स्त्री अपने स्वामी पति को तृप्त करती है, उसी को पति भी नित्य आनन्दित करे ॥२६ ॥

संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनः सा कीदृशी भवेदित्याह ॥

अन्वय:

(अषाढा) शत्रुभिरसह्यमाना (असि) (सहमाना) पत्यादीन् सोढुमर्हा (सहस्व) (अरातीः) शत्रून् (सहस्व) (पृतनायतः) आत्मनः पृतनां सेनामिच्छतः (सहस्रवीर्य्या) असंख्यातपराक्रमा (असि) (सा) (मा) माम् (जिन्व) प्रीणीहि। [अयं मन्त्रः शत०७.४.२.३९ व्याख्यातः] ॥२६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे पत्नि ! या त्वमषाढासि सा त्वं सहमाना सती पतिं मां सहस्व। या त्वं सहस्रवीर्याऽसि सा त्वं पृतनायतोऽरातीः सहस्व, यथाहं त्वां प्रीणामि पतिं तथा मा च जिन्व ॥२६ ॥
भावार्थभाषाः - या कृतदीर्घब्रह्मचर्य्यबलिष्ठा जितेन्द्रिया वसन्ताद्यृतुकृत्यविलक्षणा पत्यपराधक्षमाकारिणी शत्रुनिवारिकोत्तमपराक्रमा स्त्री नित्यं स्वस्वामिनं प्रीणाति, तां पतिरपि नित्यमानन्दयेत् ॥२६ ॥

मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी पुष्कळ वर्षे ब्रह्मचारिणी राहिलेली, अत्यंत बलवान, जितेंद्रिय, वसंत वगैरे ऋतूतील वेगवेगळी कामे जाणणारी, पतीच्या अपराधांना क्षमा करणारी आणि शत्रूंचे निवारण करणारी, उत्तम पराक्रमाने युक्त स्त्री आपल्या पतीला तृप्त करणारी असते अशा स्त्रीलाच पतीही सदैव आनंदित करतो.