द्विः पञ्च स्व-सार: [दस बहिनें]
पदार्थान्वयभाषाः - यह सोम वह है (यम्) = जिसको (द्विः पञ्च) = दस [दो बार पाँच], पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व पाँच कर्मेन्द्रियाँ, (स्व-सारः) = आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाली होकर (प्रस्नापयनि) = शुद्ध कर डालती हैं । इन्द्रियाँ विषयों में न जाकर जब अन्तर्मुखी वृत्तिवाली होती हैं, तो सोम शुद्ध बना रहता है, इसे वासनाओं का उबाल मलिन नहीं करता। उस सोम को ये शुद्ध करती हैं, जो (स्वयशसम्) = मनुष्य को अपने कर्मों से यशस्वी बनाता है। (अद्रि-संहतम्) = उपासना के द्वारा [ adore] शरीर में सम्यक् गति वाला होता है [ हन् गतौ] (प्रियम्) = प्रीति का जनक है । (इन्द्रस्य काम्ये) = जितेन्द्रिय पुरुष से कामना करने योग्य है और (ऊर्मिणम्) = प्रकाश वाला है [ऊर्मि = Light] ज्ञानाग्नि को दीप्त करके हमें ज्ञान के प्रकाश को देनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- आत्मतत्त्व की ओर चलती हुई इन्द्रियाँ सोम को शुद्ध बनाये रखती हैं। यह शुद्ध सोम हमें यशस्वी व प्रकाशमय जीवन वाला बनाता है ।