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प्र हं॒सास॑स्तृ॒पलं॑ म॒न्युमच्छा॒मादस्तं॒ वृष॑गणा अयासुः । आ॒ङ्गू॒ष्यं१॒॑ पव॑मानं॒ सखा॑यो दु॒र्मर्षं॑ सा॒कं प्र व॑दन्ति वा॒णम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra haṁsāsas tṛpalam manyum acchāmād astaṁ vṛṣagaṇā ayāsuḥ | āṅgūṣyam pavamānaṁ sakhāyo durmarṣaṁ sākam pra vadanti vāṇam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । हं॒सासः॑ । तृ॒पल॑म् । म॒न्युम् । अच्छ॑ । अ॒मात् । अस्त॑म् । वृष॑ऽगणाः । अ॒या॒सुः॒ । आ॒ङ्गू॒ष्य॑म् । पव॑मानम् । सखा॑यः । दुः॒ऽमर्ष॑म् । सा॒कम् । प्र । व॒द॒न्ति॒ । वा॒णम् ॥ ९.९७.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:12» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषगणाः) विद्वानों के गण (हंसासः) हंसों के समान विचरते हुए (तृपलम्) शीघ्र ही (मन्युमच्छ, अमात्, अस्तम्) दुष्टों के दमन करनेवाले उक्त परमात्मा को (आङ्गूष्यं) जो सबका लक्ष्य है और (पवमानम्) सबको पवित्र करनेवाला है, उसको (प्रायासुः) प्राप्त होते हैं, तदनन्तर (सखायः) परस्पर मैत्रीभाव से संगत होते हुए (वाणम्) भजनीय (दुर्मर्षम्) जो दुःख से प्राप्त होने योग्य लक्ष्य है, उस लक्ष्य के (साकम्) साथ-साथ (प्रवदन्ति) वर्णन करते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष परमात्मा के सद्गुणों को परम प्रेम से धारण करते हैं, वे मानो परमात्मा के साथ मैत्री करते हैं। वास्तव में परमात्मा किसी का शत्रु वा मित्र नहीं कहा जा सकता ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तृपलं मन्युं अच्छ

पदार्थान्वयभाषाः - (हंसास:) = [हन हिंसागत्योः] पाप का विनाश करनेवाले (वृषगणाः) = [वृष-धर्म] धर्म का सदा परिगान करनेवाले, विचार करनेवाले उपासक (अमात्) = इन काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं के भय से कहीं हमें ये आक्रान्त न कर लें इस विचार से, (तृपलम्) = [क्षिप्र प्रहारिणं] इन पर शीघ्र प्रहार करनेवाले (मन्युम्) = ज्ञान के पुञ्ज [मनु अवबोधने] प्रभु की (अच्छ) = ओर (अस्तम्) = अपने घर की ओर (प्र अयासुः) = प्रकर्षेण आनेवाले होते हैं। ये 'इस वृषागण' प्रभु रूप गृह की ओर आते हैं जिससे वहाँ सुरक्षित हुए हुए वे शत्रुओं से पीड़ित न हों। वहाँ घर में स्थित हुए हुए (सखायः) = ये मित्र (साकं) = मिलकर (प्रवदन्ति) = उस प्रभु का गुणगान करते हैं, जो (आंगूष्यम्) = स्तुति के योग्य हैं, (पवमानम्) = स्तोताओं के जीवनों को पवित्र बनानेवाले हैं, (दुर्मर्षम्) = बुरी तरह से काम-क्रोधादि शत्रुओं का मर्षण करनेवाले हैं और (वाणम्) = ज्ञान की वाणियों के स्वामी हैं अथवा संभजनीय हैं। ये प्रभु ही तो हमें शत्रुओं के आक्रमण के भय से बचाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभुस्तवन ही शत्रुभय से बचने का उपाय है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषगणाः) विद्वत्सङ्घाः (हंसासः) हंसा इव विचरन्तः (तृपलं) द्रुतं (मन्युं, अच्छ, अमात्, अस्तं) दुष्टानां सम्यग्दमनकर्तारं परमात्मानं (आङ्गूष्यं) सर्वलक्ष्यं (पवमानं) पावयितारं (प्र अयासुः) प्राप्नुवन्ति, ततः (सखायः) मिथो मैत्रीभावं वर्द्धयन्तः (वाणं) भजनीयं (दुर्मर्षं) दुःखलभ्यं तं (साकं) सहैव (प्र वदन्ति) वर्णयन्ति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like hansa birds of discriminative taste by instinct, judicious poets and scholars spontaneously come home to passion and ardour of thought and imagination free from fear and violence and, together in unison as a band of friends, generous and mighty of power and understanding, sing and celebrate the adorable, pure and purifying unforgettable Soma source of beauty, music and poetry.