पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) = इस सोम के (इमे) = ये (वृषनाम) = ' शक्ति का सेचन [वृष] और रोग आदि शत्रुओं का नमन' रूप कर्म (मही) = महत्वपूर्ण है और शूषे सुखकर हैं। इसके ये कर्म (मांश्चत्वे) = अभिमान आदि शत्रुओं के विनाश के निमित्त होते हैं, और (पृशने) = [clinging to] चिपट जानेवाले, आसक्ति रूप शत्रुओं के विजय में (वधत्रे) = हिंसनशील होते हैं। सोम शक्ति के सेचन व शत्रुनमन रूप कार्यों के द्वारा हमारे अभिमान व आसक्ति रूप शत्रुओं को विनष्ट करके हमें 'निर्भय व निरहंकार' बनाता है। ऐसा बनकर के ही तो हम शान्ति को प्राप्त करते हैं । सो सोम हमें शान्ति लाभ कराता है । यह सोम (निगुतः) = अशुभ शब्द करनेवाले क्रोध आदि शत्रुओं को (अस्वापयत्) = सुला देता है (च) = और (स्नेहयत्) = इनका वध कर देता है। [स्नेहयति destroy, kill] हे सोम ! तू (अमित्रान्) = हमारे सब शत्रुओं को (अपाच) = [अप-अच] दूर कर और (इतः) = हमारे इस जीवन से (अचिता) = यज्ञों में (अग्निचयन) = न करने के भावों को (अप) = [अच] = दूर करिये। हम सोमरक्षण से यज्ञशीलता की भावना वाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम 'शक्ति से धन व शत्रुनमन' रूप कार्यों द्वारा हमारे शत्रुओं को नष्ट करते हैं। सोमरक्षण हमें यज्ञशील बनाता है ।