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मध्व॒: सूदं॑ पवस्व॒ वस्व॒ उत्सं॑ वी॒रं च॑ न॒ आ प॑वस्वा॒ भगं॑ च । स्वद॒स्वेन्द्रा॑य॒ पव॑मान इन्दो र॒यिं च॑ न॒ आ प॑वस्वा समु॒द्रात् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

madhvaḥ sūdam pavasva vasva utsaṁ vīraṁ ca na ā pavasvā bhagaṁ ca | svadasvendrāya pavamāna indo rayiṁ ca na ā pavasvā samudrāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मध्वः॑ । सूद॑म् । प॒व॒स्व॒ । वस्वः॑ । उत्स॑म् । वी॒रम् । च॒ । नः॒ । आ । प॒व॒स्व॒ । भग॑म् । च॒ । स्वद॑स्व । इन्द्रा॑य । पव॑मानः । इ॒न्दो॒ इति॑ । र॒यिम् । च॒ । नः॒ । आ । प॒व॒स्व॒ । स॒मु॒द्रात् ॥ ९.९७.४४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:44 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:44


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (मध्वः सूदम्) मधुरता के रसों को (आपवस्व) हमको दें, (वस्वः) धनों के (उत्सम्) उपयोगी ऐश्वर्य्यों को आप हमें दें और (वीरम्) वीर सन्तानों को आप (नः) हमें (आपवस्व) दें (च) और (भगम्) सब प्रकार के ऐश्वर्य्य आप हमें दें, (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये (स्वदस्व) आनन्द देकर (पवमानः) पवित्र करते हुए (रयिम्) सब प्रकार के ऐश्वर्य्यों को आप (समुद्रात्) अन्तरिक्ष से (नः) हमको (आपवस्व) दें ॥४४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा कर्मयोगी अर्थात् उद्योगी पुरुषों पर प्रसन्न होकर उन्हें नाना प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है, इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह उद्योगी बनकर परमात्मा के ऐश्वर्य्य का अधिकारी बने ॥४४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मध्वः सूदं, वस्वः उत्सम्

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले सोम ! तू (मध्वः सूदम्) = माधुर्य के झरने को [सूद = spring] (पवस्व) = प्राप्त करा । अर्थात् हमारे जीवन को माधुर्य से युक्त कर । (वस्वः उत्सम्) = वसुओं के स्रोत को तू प्राप्त करा । जीवन के लिये सब आवश्यक तत्त्व ही वसु हैं। उन सब तत्त्वों को जन्म देनेवाला यह सोम है । (च) = और हे सोम ! तू (नः) = हमारे लिये (वीरम्) = वीर सन्तानों को (च) = और (भगम्) = ऐश्वर्य को देनेवाला हो । सोमरक्षण करनेवाला पुरुष वीर सन्तानों को प्राप्त करता है और सुपथ से धनार्जन कर पाता है । हे (इन्दो) = शक्तिशाली सोम ! तू (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (स्वदस्व) = रुचिकर हो, जितेन्द्रिय पुरुष तेरे रक्षण में ही आनन्द का अनुभव करे। (च) = और (नः) = हमारे लिये समुद्रात् उस आनन्दमय प्रभु से [स+मुद्] (रयिम्) = ज्ञानैश्वर्य को (आपवस्वा) = प्राप्त करानेवाला हो । सोमरक्षण से ही हृदयस्थ प्रभु की वाणी सुन पड़ती है और वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम 'माधुर्य, वसु, वीर सन्तान, ऐश्वर्य और ज्ञानैश्वर्य' को प्राप्त करानेवाला होता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप भगवन् ! भवान् (मध्वः, सूदं) माधुर्यरसान् (आ पवस्व) मह्यं ददातु (वस्वः) धनस्य (उत्सं) उपयोगिनमैश्वर्यं च ददातु (वीरं, च) वीरसन्तानं च (नः) अस्मभ्यं (आ, पवस्व) सम्प्रददातु (भगं) विविधैश्वर्यं च ददातु (इन्द्राय) कर्मयोगिने (स्वदस्व) आनन्दं दत्त्वा (पवमानः) पवित्रयन् (रयिं) ऐश्वर्यं (समुद्रात्) अन्तरिक्षात् (नः) अस्मभ्यं (आ, पवस्व) ददातु ॥४४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pacify and consecrate the springs of honey sweets and let these flow free, let abundance of wealth, honour and excellence, let power, prosperity and glory flow to us all. Spirit and power of peace and purity, refulgent and beatific Indu, be sweet and kind for the soul. Let immense wealth flow from the bottomless sea.