पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! तू (वायुम्) = गतिशील पुरुष को, निरन्तर कर्त्तव्य कर्मों में लगे हुए पुरुष को (इष्टये) = इष्ट प्राप्ति के लिये (च) = तथा (राधसे) = कार्यों में संसिद्धि के लिये अथवा ऐश्वर्यशक्ति के लिये (मत्सिः) = आनन्दित करता है । (पूयमानः) = पवित्र किया जाता हुआ तू (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुम को सब के साथ स्नेह करनेवाले निर्दोष पुरुष को (मत्सि) = आनन्दित करता है । सोमरक्षण से ही स्फूर्ति व क्रियाशीलता उत्पन्न होती है । सोमरक्षण ही हमें सबके प्रति स्नेह व निर्दोषता की भावना वाला बनाता है। हे सोम ! तू (मारुतं शर्ध:) = प्राणों के बल को मत्सि आनन्दित करता है, समृद्ध करता है । (देवान् मत्सि) = दिव्य गुणों को हमारे में बढ़ाता है। हे (देव सोम) = प्रकाशमय सोम [वीर्य] तू (द्यावापृथिवी मत्सि) = द्युलोक व पृथिवीलोक को, मस्तिष्क व शरीर को मत्सि आनन्दित करता है । सोम के द्वारा शरीर ओजस्वी व मस्तिष्क ज्योतिर्मय बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'क्रियाशील, स्नेहयुक्त, निद्वेष, प्राण-बल-सम्पन्न, दिव्य गुणों वाला तथा दीप्त शरीर व मस्तिष्क वाला' बनाता है ।