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म॒हत्तत्सोमो॑ महि॒षश्च॑कारा॒पां यद्गर्भोऽवृ॑णीत दे॒वान् । अद॑धा॒दिन्द्रे॒ पव॑मान॒ ओजोऽज॑नय॒त्सूर्ये॒ ज्योति॒रिन्दु॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mahat tat somo mahiṣaś cakārāpāṁ yad garbho vṛṇīta devān | adadhād indre pavamāna ojo janayat sūrye jyotir induḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒हत् । तत् । सोमः॑ । म॒हि॒षः । च॒का॒र॒ । अ॒पाम् । यत् । गर्भः॑ । अवृ॑णीत । दे॒वान् । अद॑धात् । इन्द्रे॑ । पव॑मानः । ओजः॑ । अज॑नयत् । सूर्ये॑ । ज्योतिः॑ । इन्दुः॑ ॥ ९.९७.४१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:41 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:41


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) जो प्रकाशस्वरूप परमात्मा (सूर्ये) भौतिक सूर्य में (ज्योतिः) प्रकाश को (अजनयत्) उत्पन्न करता है और (पवमानः) सबको पवित्र करनेवाला वह परमात्मा (इन्द्रे) कर्मयोगी के लिये (ओजः) ज्ञानप्रकाशरूपी बल (अदधात्) धारण कराता है और (महिषः) महान् (सोमः) सोम (तत्, महत्) उस बड़े काम को (चकार) करता है, (यत्) जो (अपाम्) वाष्प-रूप-प्रकृति के अंशों में (देवान्) सूर्यादि दिव्य पदार्थों के (गर्भः) उत्पत्तिरूप गर्भ से (अवृणीत) वरण किया गया है  ॥४१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा को सूर्य्यादिकों के प्रकाशकरूप से वर्णन किया है, इसी अभिप्राय से उपनिषत्कार ऋषियों ने परमात्मा को सूर्य्यादिकों का प्रकाशक माना है ॥४१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रे ओजः, सूर्ये ज्योतिः

पदार्थान्वयभाषाः - (महिषः) = पूजा के योग्य, अत्यन्त आदरणीय (सोमः) = सोम ने (तत् महत् चकार) = वह महान् कर्म किया (यत्) = कि (अपां गर्भः) = कर्मों का धारण करनेवाला होता हुआ (देवान्) = दिव्य गुणों का (अवृणीत) = वरण करता था । सोमरक्षण द्वारा क्रियाशीलता व दिव्यता की प्राप्ति होती है। (पवमानः) = यह पवित्र करनेवाला (सोम इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (ओजः अदधात्) = ओजस्विता का स्थापन करता है । (इन्दुः) = यह शक्तिशाली सोम (सूर्ये) = [सरति] निरन्तर क्रियाशील पुरुष में (ज्योतिः अजनयत्) = प्रकाश को उत्पन्न करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम दिव्यता, ओज व ज्योति को प्राप्त कराता है। मन को दिव्य, शरीर को ओजस्वी व मस्तिष्क को ज्योतिर्मय करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) स परमात्मा (सूर्ये) भौतिकसूर्ये (ज्योतिः, अजनयत्) प्रकाशमुत्पादयति (पवमानः) सर्वस्य पावकः सः (इन्द्रे) कर्मयोगिनि (ओजः, अदधात्) ज्ञानबलं दधाति (महिषः) महान् (सोमः) परमात्मा (तत्, महत्, चकार) तत् महत्कार्यं करोति (यत्) यत् कार्यं (अपां) वाष्परूपप्रकृतेः अंशेषु (देवान्) सूर्यादिदिव्यपदार्थानां (गर्भः) उत्पत्तिरूपगर्भात् (अवृणीत) व्रियते स्म ॥४१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, potent absolute, generated the Mahat mode of Prakrti, Mother Nature, which is the womb of all elements, energies and forms of existence and which comprehends all perceptive, intelligential and psychic powers as well. And then the creative-generative lord of evolutionary action, Soma, vested lustre and energy in Indra, the soul, and, lord of light as it is, Soma vested light in the sun.