वांछित मन्त्र चुनें

प्र गा॑यता॒भ्य॑र्चाम दे॒वान्त्सोमं॑ हिनोत मह॒ते धना॑य । स्वा॒दुः प॑वाते॒ अति॒ वार॒मव्य॒मा सी॑दाति क॒लशं॑ देव॒युर्न॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra gāyatābhy arcāma devān somaṁ hinota mahate dhanāya | svāduḥ pavāte ati vāram avyam ā sīdāti kalaśaṁ devayur naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । गा॒य॒त॒ । अ॒भि । अ॒र्चा॒म॒ । दे॒वान् । सोम॑म् । हि॒नो॒त॒ । म॒ह॒ते । धना॑य । स्वा॒दुः । प॒वा॒ते॒ । अति॑ । वार॑म् । अव्य॑म् । आ । सी॒दा॒ति॒ । क॒लश॑म् । दे॒व॒ऽयुः । नः॒ ॥ ९.९७.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! तुम लोग (महते, धनाय) बड़े ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये (देवान्) विद्वान् लोगों का (प्र, गायत) स्तवन करो (अभ्यर्चामः) और उन्हीं का सत्कार करो और (सोमं) उनमें जो सौम्यगुणसम्पन्न विद्वान् हैं, उनको (हिनोत) प्रेरणा करो कि वह तुमको सदुपदेश करें और (स्वादुः) आनन्ददायक पदार्थों के लिये (पवाते) पवित्र करें। (देवयुः) दिव्यगुण और (वारं) वरणीय (अव्यं) रक्षक उक्त विद्वान् (नः) हमारे (कलशं) अन्तः करण में (आसीदति) स्थिर हों ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषों ! तुम कल्याण की प्राप्ति के लिये विद्वानों का सत्कार करो ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महते धनाय

पदार्थान्वयभाषाः - हे जीवो! (प्रगायत) = खूब ही प्रभु का गायन करो और हम सब (देवान् अभ्यर्चाम) = 'माता, पिता, आचार्य' आदि देवों का आदर करें, शुश्रूषण करें। इसी प्रकार हम वासना से बच सकेंगे वासना से ऊपर उठकर (सोमं हिनोत) = सोम को अपने अन्दर प्रेरित करो । यह अन्दर प्रेरित हुआ- हुआ सोम तुम्हारे (महते धनाय) = महान् ऐश्वर्य के लिये होगा । सोम ही तो सब कोशों को ऐश्वर्ययुक्त करता है। यह सोम (स्वादुः) = हमारे जीवनों को मधुर बनानेवाला है यह (वारम्) = वासनाओं का निवारण करनेवाले पुरुष को, (अव्यम्) = रक्षण करने वालों में उत्तम पुरुष को (अति) = अतिशयेन (पवाते) = प्राप्त होता है। (देवयुः) = दिव्यगुणों को हमारे साथ जोड़नेवाला यह सोम (नः कलशम्) = हमारे शरीररूपी कलश में (आसीदाति) = आसीन होता है। शरीर में स्थिर हुआ हुआ यह सोम ही शरीर की सब कलाओं का साधक होता है। यही इसे 'स-कल' [पूर्ण] बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का स्तवन व माता-पिता, आचार्य आदि देवों का अर्चन हमें सोमरक्षण के योग्य बनाता है। क्योंकि इस प्रकार हम वासनाओं से बचे रहते हैं । सुरक्षित सोम हमारे महान् ऐश्वर्य का साधक होता है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! यूयं (महते, धनाय) महैश्वर्यप्राप्तये (देवान्) विदुषः (प्र गायत) स्तुत (अभि अर्चाम) तानेव सत्कुरुत (सोमं) तत्र च सौम्यस्वभावं विद्वांसं (हिनोतु) प्रेरयत, यतः युष्मान् स समुपदिशतु (स्वादुः) आनन्दप्रदपदार्थाय च (पवाते) पावयतु (वारं, अव्यं) वरणीयः रक्षकश्च स विद्वान् (नः) अस्माकं (कलशं) हृदये (आ सीदति) स्थिरो भवतु ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Sing and celebrate, let us honour the divinities and exhort Soma for great victory and achievement of wealth, honour and excellence. Sweet and lovable, Soma rises to the protective position of choice and, loving the divinities, it abides in the right position at the centre.