पदार्थान्वयभाषाः - हे जीवो! (प्रगायत) = खूब ही प्रभु का गायन करो और हम सब (देवान् अभ्यर्चाम) = 'माता, पिता, आचार्य' आदि देवों का आदर करें, शुश्रूषण करें। इसी प्रकार हम वासना से बच सकेंगे वासना से ऊपर उठकर (सोमं हिनोत) = सोम को अपने अन्दर प्रेरित करो । यह अन्दर प्रेरित हुआ- हुआ सोम तुम्हारे (महते धनाय) = महान् ऐश्वर्य के लिये होगा । सोम ही तो सब कोशों को ऐश्वर्ययुक्त करता है। यह सोम (स्वादुः) = हमारे जीवनों को मधुर बनानेवाला है यह (वारम्) = वासनाओं का निवारण करनेवाले पुरुष को, (अव्यम्) = रक्षण करने वालों में उत्तम पुरुष को (अति) = अतिशयेन (पवाते) = प्राप्त होता है। (देवयुः) = दिव्यगुणों को हमारे साथ जोड़नेवाला यह सोम (नः कलशम्) = हमारे शरीररूपी कलश में (आसीदाति) = आसीन होता है। शरीर में स्थिर हुआ हुआ यह सोम ही शरीर की सब कलाओं का साधक होता है। यही इसे 'स-कल' [पूर्ण] बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का स्तवन व माता-पिता, आचार्य आदि देवों का अर्चन हमें सोमरक्षण के योग्य बनाता है। क्योंकि इस प्रकार हम वासनाओं से बचे रहते हैं । सुरक्षित सोम हमारे महान् ऐश्वर्य का साधक होता है ।