वर्धया वाचं, जनया पुरन्धिम्
पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्य ! (एवा) = गतिशीलता के द्वारा [इ गतौ] (परिषिच्यमानः) = शरीर में चारों ओर सिक्त किया जाता हुआ, (पूयमानः) = वासनाओं के उबाल से मलिन न किया जाता हुआ तू (नः स्वस्तिः) = हमारे लिये कल्याण को (आपवस्व) = प्राप्त करा । (बृहता रवेण) = महान् स्व शब्द के हेतु से (इन्द्रं आविश) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को तू प्राप्त हो, इसके शरीर में सर्वत्र प्रवेश वाला हो। तेरे प्रवेश से ही हृदय की पवित्रता होकर हृदयस्थ प्रभु की वाणी सुन पड़ेगी। यह 'आत्मा की आवाज' ही सर्वमहान् शब्द है । यह श्रोता की वृद्धि का कारण बनता है। हे सोम ! तू (वाचं वर्धया) = हमारे जीवन में इस ज्ञान की वाणी का वर्धन कर और (पुरन्धिम्) = पालक व पूरक बुद्धि को (जनया) = प्रादुर्भूत कर। सोमरक्षण से ही ज्ञान की वाणियों को हम समझने के योग्य बनते हैं और उत्कृष्ट बुद्धि को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम कल्याण [नीरोगता आदि] का साधक है, हृदयस्थ प्रभु की प्रेरणा को सुनने के योग्य बनाता है, इसके रक्षण से ज्ञान की वाणियों को हम समझने लगते हैं, बुद्धि की वृद्धि होती है ।