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सोमं॒ गावो॑ धे॒नवो॑ वावशा॒नाः सोमं॒ विप्रा॑ म॒तिभि॑: पृ॒च्छमा॑नाः । सोम॑: सु॒तः पू॑यते अ॒ज्यमा॑न॒: सोमे॑ अ॒र्कास्त्रि॒ष्टुभ॒: सं न॑वन्ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

somaṁ gāvo dhenavo vāvaśānāḥ somaṁ viprā matibhiḥ pṛcchamānāḥ | somaḥ sutaḥ pūyate ajyamānaḥ some arkās triṣṭubhaḥ saṁ navante ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सोम॑म् । गावः॑ । धे॒नवः॑ । वा॒व॒शा॒नाः । सोम॑म् । विप्राः॑ । म॒तिऽभिः॑ । पृ॒च्छमा॑नाः । सोमः॑ । सु॒तः । पू॒य॒ते॒ । अ॒ज्यमा॑नः । सोमे॑ । अ॒र्काः । त्रि॒ऽस्तुभः॑ । सम् । न॒व॒न्ते॒ ॥ ९.९७.३५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:35 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:17» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:35


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमम्) उक्त परमात्मा की (गावो, धेनवः) ज्ञानरूप वाणियें इच्छा करती हैं, (सोमम्) उक्त परमात्मा की (विप्राः) मेधावी लोग (मतिभिः) ज्ञान द्वारा (पृच्छमानाः) जिज्ञासा करते हैं, (अज्यमानः) उपासना किया हुआ (सुतः) आविर्भाव को प्राप्त हुआ (सोमः) परमात्मा (पूयते) साक्षात्कार किया जाता है (सोमे) उक्त परमात्मा में (त्रिष्टुभः) कर्म, उपासना, ज्ञानरूप तीनों प्रकार की वाणियें (अर्काः) जो परमात्मा की अर्चना करनेवाली हैं, वे (सं नवन्ते) संगत होती हैं ॥३५॥
भावार्थभाषाः - कर्म, उपासना तथा ज्ञान, तीनों प्रकार के भावों को वर्णन करनेवाली वेदरूपी वाणियें एकमात्र परमात्मा में ही संगत होती हैं अथवा यों कहो कि जिस प्रकार सब नदियें समुद्र की ओर प्रवाहित होती हैं, इसी प्रकार वेदरूपी वाणियें परमात्मरूपी समुद्र की शरण लेती हैं ॥३५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिष्टुभः अर्काः

पदार्थान्वयभाषाः - (धेनवः) = से प्रीणित करनेवाली (गावः) = वेदवाणी रूप गौवें (वावशाना:) = प्रबल कामना वाली होती हुई (सोमं) = उस शान्त प्रभु की ओर (सं नवन्ते) = जाती हैं। ये सब वेदवाणियाँ प्रभु का ही ज्ञान देती हैं । (विप्राः) = ज्ञानी पुरुष (मतिभिः) = मननवाली बुद्धियों से (सोमं पृच्छमानाः) = उस शान्त प्रभु को जानने की इच्छा करते हुए गति करते हैं। ऐसा होने पर शरीर में (सुतः) = उत्पन्न (सोम:) = वीर्य (पूयते) = पवित्र होता है यह (अज्यमान:) = यह शरीर में ही अलंकृत किया जाता है। इस (सोमम्) = सोम के सुरक्षित होने पर (त्रिष्टुभः) = काम-क्रोध-लोभ सभी को रोकनेवाली (अर्क:) = ये प्रकाशमयी वाणियाँ (सं नवन्ते) = हमें सम्यक् प्राप्त होती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब वेदवाणियाँ प्रभु की ओर जाती हैं। सोमरक्षण द्वारा ही हम इन्हें प्राप्त करते हैं।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमं) उक्तपरमात्मानं (गावः, धेनवः) ज्ञानमयवाचः (वावशानाः) वाञ्छन्ति (सोमं) तमेव परमात्मानं (विप्राः) मेधाविजनाः (मतिभिः) ज्ञानैः (पृच्छमानाः) जिज्ञासन्ते (अज्यमानः) उपासितः (सुतः) आविर्भूतः (सोमः) परमात्मा (पूयते) साक्षात्क्रियते (सोमे) तस्मिन् परमात्मनि (त्रिष्टुभः) कर्मोपासनाज्ञानविषयास्त्रिप्रकारा अपि वाचः (अर्काः) याश्च परमात्मनोऽर्चिकाः ताः (सं, नवन्ते) संगता भवन्ति ॥३५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Dynamic and creative languages of love and faith celebrate Soma, the languages of scholars enquiring into reality with thought and analysis concentrate on Soma. It is Soma which, distilled from observation and experience and crystallised in nature and function, is sought to be comprehended or apprehended in the language medium. Indeed all speech media of description, definition, comprehension, apprehension, celebration or adoration arise from Soma and merge into Soma.