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ति॒स्रो वाच॑ ईरयति॒ प्र वह्नि॑ॠ॒तस्य॑ धी॒तिं ब्रह्म॑णो मनी॒षाम् । गावो॑ यन्ति॒ गोप॑तिं पृ॒च्छमा॑ना॒: सोमं॑ यन्ति म॒तयो॑ वावशा॒नाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tisro vāca īrayati pra vahnir ṛtasya dhītim brahmaṇo manīṣām | gāvo yanti gopatim pṛcchamānāḥ somaṁ yanti matayo vāvaśānāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ति॒स्रः । वाचः॑ । ई॒र॒य॒ति॒ । प्र । वह्निः॑ । ऋ॒तस्य॑ । धी॒तिम् । ब्रह्म॑णः । म॒नी॒षाम् । गावः॑ । य॒न्ति॒ । गोऽप॑तिम् । पृ॒च्छमा॑नाः । सोम॑म् । य॒न्ति॒ । म॒तयः॑ । वा॒व॒शा॒नाः ॥ ९.९७.३४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:34 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:17» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:34


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वह्निः) “वहतीति वह्निः” सर्वप्रेरक परमात्मा (तिस्रो वाचः) तीन प्रकार की वाणियों की (प्रेरयति) प्रेरणा करता है। उक्त वाणी (ऋतस्य, धीतिम्) सच्चाई का धारण करनेवाली है, (ब्रह्मणः) शब्दब्रह्मरूप वेद का (मनीषाम्) मनरूप है, ऐसी वाणी की उक्त परमात्मा प्रेरणा करता है, (गोपतिम्) जिस तरह प्रकाशों के पति सूर्य्य को (गावः) किरणें (यन्ति) प्राप्त होती हैं, इसी प्रकार (वावशानाः) कामनावाले जिज्ञासु (पृच्छमानाः) जिनको ज्ञान की जिज्ञासा है, वैसे (मतयः) मेधावी लोग (सोमम्) परमात्मा को (यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥३४॥
भावार्थभाषाः - जो लोग अपने शील को बनाते हैं अर्थात् सदाचारी बनकर परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव अपने ज्ञान से प्रदीप्त करता है ॥३४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तिस्रः वाचः

पदार्थान्वयभाषाः - (प्र वह्निः) = प्रकर्षेण हमारा वहन करनेवाले, सब का धारण करनेवाले वे प्रभु हृदयस्थ रूपेण (तिस्रः वाचः) = 'ऋग्, यजु, साम' रूप तीन वाणियों को, विज्ञान कर्म व उपासना के उपदेश को (ईरयति) = हमारे में प्रेरित करते हैं। इस वाणी के (ऋतस्य धीतिम्) = यज्ञों के धारण को तथा (ब्रह्मणः मनीषाम्) = ज्ञानदायिनी बुद्धि को प्रेरित करते हैं। इस ज्ञान की वाणी को सुनने पर (गावः) = सब इन्द्रियाँ (गोपतिं) = इन्द्रियों के स्वामी इन्द्र को (पृच्छमानाः) = जानने की इच्छा करती हुई (यन्ति) = अन्तर्मुखी गति वाली होती हैं। भटकने को छोड़कर आत्मतत्त्व की जिज्ञासा वाली बनती हैं। उस समय (वावशाना:) = प्रभु प्राप्ति की प्रबल कामना वाले (मतयः) = मननपूर्वक स्तुति करनेवाले लोग (सोमं यन्ति) = सोम की ओर जाते हैं, सोमरक्षण द्वारा ही तो वे उस 'सोम' शान्त प्रभु को प्राप्त करेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु वेदवाणी द्वारा हम यज्ञों व ज्ञान व उपासना में प्रेरित करते हैं। इससे हमारी इन्द्रियाँ विषयों में न भटक कर आत्मतत्त्व की ओर चलती हैं और हमारी बुद्धियाँ उस सोम 'शान्त प्रभु' को पाने के लिये यत्नशील होती हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वह्निः) सर्वप्रेरकः परमात्मा (तिस्रः, वाचः) त्रिप्रकारा वाणीः (प्रेरयति) प्रेरिताः करोति सा च वाणी (ऋतस्य, धीतिं) सत्यताया धारिका (ब्रह्मणः) शब्दब्रह्मरूपवेदानां (मनीषां) मनोरूपा एवम्भूतां वाचं प्रेरयति (गोपतिं) यथा तेजोधिपं सूर्यं (गावः, यन्ति) किरणाः प्राप्नुवन्ति इत्थं हि (वावशानाः) कामयमानाः (पृच्छमानाः) जिज्ञासवः (मतयः) मेधाविनः (सोमं, यान्ति) परमात्मानं प्राप्नुवन्ति ॥३४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma inspires three orders of speech: practical speech that carries on the daily business of life, the thought that conceives of the vibrant immanent divine presence, and the deeper language of silence which is the mode of transcendent reality. The language operations of daily business move in search of the master source of world mystery as in science and philosophy, and the speech of thought and imagination and of love and worship moves to the presence of peace and bliss, Soma. (The three speeches in Vedic language are Ida, Sarasvati, and Mahi or Bharati as described in Rgveda 1, 13, 9 and Yajurveda 21, 19. Explained another way these are the language of the Rks or knowledge, Yajus or karma, and Samans or worship.)