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दि॒व्यः सु॑प॒र्णोऽव॑ चक्षि सोम॒ पिन्व॒न्धारा॒: कर्म॑णा दे॒ववी॑तौ । एन्दो॑ विश क॒लशं॑ सोम॒धानं॒ क्रन्द॑न्निहि॒ सूर्य॒स्योप॑ र॒श्मिम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

divyaḥ suparṇo va cakṣi soma pinvan dhārāḥ karmaṇā devavītau | endo viśa kalaśaṁ somadhānaṁ krandann ihi sūryasyopa raśmim ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दि॒व्यः । सु॒ऽप॒र्णः । अव॑ । च॒क्षि॒ । सो॒म॒ । पिन्व॑न् । धाराः॑ । कर्म॑णा । दे॒वऽवी॑तौ । आ । इ॒न्दो॒ इति॑ । वि॒श॒ । क॒लश॑म् । सो॒म॒ऽधान॑म् । क्रन्द॑न् । इ॒हि॒ । सूर्य॑स्य । उप॑ । र॒श्मिम् ॥ ९.९७.३३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:33 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:17» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:33


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! आप (दिव्यः) दिव्यस्वरूप हैं (सुपर्णः) चेतन हैं (अवचक्षि) आप हमको सदुपदेश करें, (सोम) हे सोम ! (देववीतौ) देवताओं के यज्ञ में (कर्मणा) रक्षा से (पिन्वन्) पुष्ट करते हुए आप (धाराः) अपनी कृपामयी वृष्टि से पुष्ट करें, (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (सोमधानम्) सोमगुण के धारण करनेवाले (कलशम्) अन्तःकरण को (विश) प्रवेश करें और (सूर्यस्य रश्मिम्) ज्ञान की रश्मियों का (क्रन्दन्) उपदेश करते हुए (उप, एहि) आकर प्राप्त हों ॥३३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया है कि परमात्मा स्वतः ज्ञानस्वरूप है अर्थात् स्वतःप्रकाश है ॥३३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमधानं कलशम् आविश

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्य! तू (दिव्यः) = हमारे जीवनों को प्रकाशमय [दिव्य] बनानेवाला है, (सुपर्णः) = उत्तमता से पालन व पूरण करनेवाला है। (देववीतौ) = दिव्यगुणों की प्राप्ति के निमित्त (कर्मणा) = क्रियाशीलता के साथ (धाराः पिन्वन्) = धारण शक्तियों को पूरित करता हुआ तू (अवचक्षि) = सब रोग आदि को दूर भगानेवाला होता है। [to look down upon ] इन रोगादि घृणा की दृष्टि से तू देखनेवाला होता है (इन्दो) = हे सोम ! तू (सोमधानम्) = प्रभु से सोम के आधार के रूप में बनाये गये (कलशम्) = इस शरीर कलश में (आविश) = तू समन्तात् प्रवेश वाला हो । तू (क्रन्दन्) = प्रभु का आह्वान करता हुआ (सूर्यस्य) = ज्ञानसूर्य की (रश्मिम्) = किरणों को उप इहि प्राप्त कर । तेरे रक्षण द्वारा हमारे जीवन में प्रभुस्तवन व ज्ञान दीप्त हो उठें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम से 'क्रियाशक्ति, दिव्यगुण, प्रभुस्तवन व ज्ञानरश्मियाँ' प्राप्त हों ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! भवान् (दिव्यः) दिव्यस्वरूपः (सुपर्णः) चेतनः (अव, चक्षि) मां साधूपदिशतु (सोम) हे सौम्य ! (देववीतौ) देवानां यज्ञे (कर्मणा, पिन्वन्) साधुरक्षया पोषयन् (धाराः) स्वकृपादृष्ट्या पोषयतु (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! भवान् (सोमधानं) सौम्यगुणानां धारकः (कलशं, विश) अन्तःकरणं प्रविशतु (सूर्यस्य, रश्मिं) ज्ञानकरान् (क्रन्दन्) उपदिशन् (उप, एहि) प्राप्नोतु ॥३३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Heavenly light, super-abundant spirit of peace, protection and divine bliss, O Soma, reveal yourself, speak and shine, and let the rising streams of your presence flow into our divine life-yajna with higher and higher potential. O Spirit of peace and protection, bliss and beauty, consecrate this heart-core of the soul open to Soma, awaiting, come resounding, and let the radiations of refulgent divinity illuminate and sanctify us.