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जुष्टो॒ मदा॑य दे॒वता॑त इन्दो॒ परि॒ ष्णुना॑ धन्व॒ सानो॒ अव्ये॑ । स॒हस्र॑धारः सुर॒भिरद॑ब्ध॒: परि॑ स्रव॒ वाज॑सातौ नृ॒षह्ये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

juṣṭo madāya devatāta indo pari ṣṇunā dhanva sāno avye | sahasradhāraḥ surabhir adabdhaḥ pari srava vājasātau nṛṣahye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

जुष्टः॑ । मदा॑य । दे॒वऽता॑ते । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्नुना॑ । ध॒न्व॒ । सानौ॑ । अव्ये॑ । स॒हस्र॑ऽधारः । सु॒ऽर॒भिः । अद॑ब्धः । परि॑ । स्र॒व॒ । वाज॑ऽसातौ । नृ॒ऽसह्ये॑ ॥ ९.९७.१९

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:19 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:19


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रधारः) अनन्त शक्तियुक्त परमात्मा (सुरभिरदब्धः) किसी से न दबाये जानेवाला (वाजसातौ) यज्ञ में (नृषह्ये) जो मनुष्यों के तपोबल का वर्धक है और (अव्ये) सबका रक्षक है (सानौ) रक्षारूप उच्च शिखर पर (ष्णुना) अपने प्रवाह से (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! तुम (परि धन्व, परि स्रव) हमको चारों ओर से बढ़ाओ तथा सब ओर से रक्षा करो, क्योंकि आप (देवताते) विद्वानों के विस्तृत यज्ञ में (मदाय) आनन्द को (जुष्टः) प्रीति से सेवन करनेवाले हैं ॥१९॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनकी सदैव रक्षा करता है ॥१९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुरभिः अदब्धः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्दो) = सोम ! (मदाय) = उल्लास की प्राप्ति के लिये सेवित हुआ हुआ तू (देवताते) = दिव्यगुणों का विस्तार करनेवाले (अव्ये) = रक्षकों में उत्तम पुरुष में (स्नुना:) = अपने प्रवाह से (सानो) = शिखर प्रदेश में, मस्तिष्क रूप द्युलोक में (परिधन्वः) = गतिवाला हो । वहाँ मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का तू ईंधन बन । (सहस्त्रधारः) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाला, (सुरभिः) = जीवन को सुगन्धित व यशस्वी बनानेवाला, (अदब्धः) = रोगों व वासनाओं से हिंसित न हुआ हुआ तू नृषह्ये नरों द्वारा शत्रुओं का मर्षण करने योग्य (वाजसातौ) = शक्ति प्राप्ति के साधनभूत संग्राम में (परिस्त्रव) = हमारे शरीरों में चारों ओर गतिवाला हो । सुरक्षित सोम ही तो रोगों व वासनाओं का संहार करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें अध्यात्म संग्राम में विजयी बनाये। ज्ञानाग्नि को दीप्त करे। हमारे जीवन को यशस्वी करे और उल्लासमय बनाये ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रधारः) अनन्तशक्तिरीश्वरः (सुरभिः, अदब्धः) केनापि अनभिभाव्यः (वाजसातौ) यज्ञे (नृषह्ये) मनुष्याणां तपोबलस्योन्नेतास्ति (अव्ये, सानौ) रक्षारूपस्य स्वरूपोच्चशिखरे (ष्णुना) स्वप्रवाहैः (इन्दो) हे परमात्मन् ! (परि धन्व, परि स्रव) अभितो भवान् आगत्य वर्धयतु, अन्यच्च सर्वतो रक्षतु, यतः (देवताते) विदुषां विस्तृतयज्ञे (मदाय) आनन्दस्य (जुष्टः) प्रीत्यानुभवितास्ति भवान् ॥१९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, refulgent spirit of divinity, lover of joy and loved for the sake of joy, in yajna, pray flow, inspire and energise us on top of safety, security and prosperity with incessant stream of joy. Undaunted and invincible, let a thousand streams of ecstasy flow, let the breeze of fragrance blow, in the battle for victory worthy of brave humanity.