वांछित मन्त्र चुनें

ए॒वा प॑वस्व मदि॒रो मदा॑योदग्रा॒भस्य॑ न॒मय॑न्वध॒स्नैः । परि॒ वर्णं॒ भर॑माणो॒ रुश॑न्तं ग॒व्युर्नो॑ अर्ष॒ परि॑ सोम सि॒क्तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā pavasva madiro madāyodagrābhasya namayan vadhasnaiḥ | pari varṇam bharamāṇo ruśantaṁ gavyur no arṣa pari soma siktaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । प॒व॒स्व॒ । म॒दि॒रः । मदा॑य । उ॒द॒ऽग्रा॒भस्य॑ । न॒मय॑न् । व॒ध॒ऽस्नैः । परि॑ । वर्ण॑म् । भर॑माणः । रुश॑न्तम् । ग॒व्युः । नः॒ । अ॒र्ष॒ । परि॑ । सो॒म॒ । सि॒क्तः ॥ ९.९७.१५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:15 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:15


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मदिरः) हे आनन्दस्वरूप परमात्मन् ! (मदाय) हमारे आनन्द के लिये आप (उदग्राभस्य) अज्ञान के बादल को (वधस्नैर्नमयन्) अपने बाधक शस्त्रों से नम्र करते हुए (रुशन्तम्) दीप्तिवाले (गव्युः) ज्ञान को (नः) हमारे लिये (पर्य्यर्ष) प्रदान कीजिये। (सोम) हे सौम्यगुण सम्पन्न परमात्मन् ! (वर्णं, भरमाणः) हममें योग्यता को करते हुए आप (परि सिक्तः) हमारे लिये ज्ञानप्रद हूजिये ॥१५॥
भावार्थभाषाः - जो लोग अनन्य भक्ति से परमात्मा का भजन करते हैं, परमात्मा उनके अज्ञान के बीज को छिन्न-भिन्न करके अवश्यमेव ज्ञान का प्रकाश करता है ॥१५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रुशन्तं भरमाणः

पदार्थान्वयभाषाः - शरीर में जल रेतः कणों के रूप में है। इनका संयम [ग्रहण] करनेवाला व्यक्ति 'उद-ग्राभ' है । हे सोम ! (एवा) = [इ गतौ] गतिशीलता के द्वारा पवस्व हमें प्राप्त हो । (मदिरः) = तू मद व उल्लास का जनक है। (उद-ग्राभस्य) = रेतः कणों का ग्रहण व रक्षण करनेवाले के (मदायः) = तू आनन्द के लिये होता है । (वधस्त्रैः) = अपने हनन साधन आयुधों से तेजस्विता रूप अश्वों से (नमयन्) = तू शत्रुओं को नतमस्तक करनेवाला होता है। वस्तुतः शत्रुओं को नष्ट करते ही तू आनन्द का जनक होता है। रोग व वासना रूप शत्रुओं को नष्ट करके (रुशन्तं वर्णम्) = चमकते हुए रूप को (भरमाणः) = धारण करता हुआ, (गव्युः) = उत्तम इन्द्रियों को हमारे साथ जोड़ने की कामना वाला (परिसिक्तः) = शरीर में चारों ओर सिक्त हुआ हुआ तू परि अर्षा शरीर में चारों ओर गतिवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का रक्षक पुरुष आनन्दमय जीवन वाला होता है, इसके रोग व वासना रूप शत्रु नष्ट हो जाते हैं, यह दीप्तरूप को धारण करता है, प्रशस्त इन्द्रियोंवाला होता है।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मदिरः) हे आनन्दस्वरूपपरमात्मन् ! (मदाय) आनन्दाय (उदग्राभस्य) अज्ञानमेघान् (वधस्नैः, नमयन्) स्वबाधकशस्त्रैर्नम्रीकुर्वन् (रुशन्तं) दीप्तिमत् (गव्युः) ज्ञानम् (नः) अस्मभ्यं (परि अर्ष) प्रयच्छतु (सोम) हे सौम्यगुणसम्पन्नभगवन् ! (वर्णं, भरमाणः) अस्मासु योग्यतां समुत्पादयन् (परि सिक्तः) ज्ञानप्रदो भवतु ॥१५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus vibrate and flow on, spirit of ecstasy, for joy, bending and breaking the clouds which hold up the rain and radiations of light, and, bearing bright light and illuminative varieties of knowledge, continue to flow on, O Soma, generous and exalted presence, lover of showers and light and bearer of the bolt of power and force to strike down the negativities.