पदार्थान्वयभाषाः - यह सोम (वृषा) = सब अंगों में शक्ति का सेचन करनेवाला है, (शोण:) = तेजस्वी है । (गाः अभिकनिक्रदद्) = ज्ञान की वाणियों का हमारे में उच्चारण करता है, यह उन ज्ञान की वाणियों को हमें सुनने के योग्य बनाता है जो कि प्रभु से हृदयों में उच्चारित हो रही हैं। (नदयन्) = यह हमें प्रभु के स्तुति-वचनों का उच्चारण करनेवाला बनाता हुआ (पृथिवीं उत द्यां एति) = इस शरीररूप पृथिवी व मस्तिष्करूप द्युलोक में प्राप्त होता है। शरीर को यह सशक्त बनाता है, तो मस्तिष्क को दीप्तिमय । इस सोम के रक्षण के होने पर (आजौ) = संग्राम में (इन्द्रस्य इव) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले सेनापति के शब्द की तरह इस सोम का (वग्ग्रुः) = शब्द (आशृण्व) = सर्वतः सुनाई पड़ता है । यह सोम शरीर में रोगकृमियों को व काम-क्रोध आदि आसुरभावों को विनष्ट करनेवाला होता है। यह सोम (इमां वाचम्) = प्रभु की इस वाणी को (प्रचेतयन्) = अच्छी प्रकार हमारे ज्ञान का विषय बनाता हुआ (आ अर्षति) = शरीर में सर्वत्र गतिवाला होता है । सोमरक्षण हमें तीव्र बुद्धि बनाकर प्रभु की वाणी को समझने के योग्य बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें शक्ति देता है, प्रभु की प्रेरणा को सुनने के योग्य करता है, हमें प्रभु का स्तोता बनाता है, शरीरस्थ शत्रुओं का नाश करता है और वेदवाणी को समझने योग्य बनाता है ।