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अध॒ धार॑या॒ मध्वा॑ पृचा॒नस्ति॒रो रोम॑ पवते॒ अद्रि॑दुग्धः । इन्दु॒रिन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑षा॒णो दे॒वो दे॒वस्य॑ मत्स॒रो मदा॑य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adha dhārayā madhvā pṛcānas tiro roma pavate adridugdhaḥ | indur indrasya sakhyaṁ juṣāṇo devo devasya matsaro madāya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध॑ । धार॑या । मध्वा॑ । पृ॒चा॒नः । ति॒रः । रोम॑ । प॒व॒ते॒ । अद्रि॑ऽदुग्धः । इन्दुः॑ । इन्द्र॑स्य । स॒ख्यम् । जु॒षा॒णः । दे॒वः । दे॒वस्य॑ । म॒त्स॒रः । मदा॑य ॥ ९.९७.११

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:11 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:11


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिदुग्धः) चित्तवृत्तियों से साक्षात्कार किया हुआ परमात्मा (पवते) इसको पवित्र करता है (अध) और (मध्वा, धारया) आनन्द की धाराओं से (पृचानः) विद्वानों को तृप्त करता हुआ (रोम, तिरः) अज्ञान को तिरस्कृत करके हमको पवित्र करे और (देवस्य) उक्त दिव्यरूप परमात्मा का (मत्सरः) आह्लादक जो आनन्द है, वह (मदाय) हमारे लिये मोदक लिये हो। (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मा के (सख्यम्) मैत्रीभाव को (जुषाणः) सेवन करता हुआ (इन्दुः) प्रकाशस्वरूप (देवः) विद्वान् सद्गति को प्राप्त होता है ॥११॥
भावार्थभाषाः - अज्ञान की निवृत्ति के लिये परमात्मा की उपासना सर्वोपरि साधन है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्तिरः रोम पवते

पदार्थान्वयभाषाः - (अध) = अब यह सोम (मध्वा धारया) = माधुर्ययुक्त धारणशक्ति से (पृचानः) = हमें संपृक्त करता हुआ (तिर:) = अन्तर्हित सोम [रु शब्दे] = शब्द को पवते प्राप्त कराता है। यह अन्तर्हित शब्द ही 'प्रभु प्रेरणा' है। इसे सामन्यतः हम सुन नहीं पाते । सोमरक्षण से पवित्र हृदय वाले होकर हम इसे सुनने के योग्य होते हैं । यह सोम (अद्रिदुग्ध:) = [ adore = आदृ] प्रभु के उपासकों से अपने में पूरित किया जाता है । (इन्दुः) = यह शक्तिशाली सोम (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष की (सख्यम्) = मित्रता को (जुषाण:) = सेवित करता हुआ (देवः) = प्रकाशमयता को देनेवाला होता है [ देवः द्योतनात्] । यह (मत्सरः) = आनन्द का संचय करनेवाला सोम देवस्य उस प्रकाशमय जीवनवाले सोमरक्षक पुरुष के (मदाय) = उल्लास के लिये होता है, सोमरक्षण से जीवन उल्लासमय बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से जीवन मधुर, उल्लासमय व प्रकाशमय बनता है । सोमरक्षण हमें प्रभु प्रेरणा के सुनने के योग्य बनाता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिदुग्धः) चित्तवृत्त्या साक्षात्कृतः स परमात्मा (पवते) अस्मान् पुनाति (अध) अथ च (मध्वा, धारया) आनन्दधारया (पृचानः) विदुषस्तर्पयन् (रोम, तिरः) अज्ञानं तिरस्कुर्वन् मां पुनाति (देवस्य) दिव्यरूपस्य तस्य (मत्सरः) आह्लादकानन्दः (मदाय) अस्मन्मोदाय भवतु (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवतस्तस्य (सख्यं) मित्रतां (जुषाणः) सेवमानः (देवः) विद्वान् (इन्दुः) प्रकाशस्वरूपः सन् सद्गतिं लभते ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And by streams of honey shower, joining spiritual awareness, overflowing the heart cave, Soma, distilled from the adamantine practice of meditative self- control, flows pure, purifying, wholly fulfilling. The brilliant divine spirit of joy cherishing friendly communion with Indra, the Soul, is the ecstasy meant for the joyous fulfilment of the soul.