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इन्दु॑र्वा॒जी प॑वते॒ गोन्यो॑घा॒ इन्द्रे॒ सोम॒: सह॒ इन्व॒न्मदा॑य । हन्ति॒ रक्षो॒ बाध॑ते॒ पर्यरा॑ती॒र्वरि॑वः कृ॒ण्वन्वृ॒जन॑स्य॒ राजा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indur vājī pavate gonyoghā indre somaḥ saha invan madāya | hanti rakṣo bādhate pary arātīr varivaḥ kṛṇvan vṛjanasya rājā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्दुः॑ । वा॒जी । प॒व॒ते॒ । गोऽन्यो॑घाः । इन्द्रे॑ । सोमः॑ । सह॑ । इन्व॑न् । मदा॑य । हन्ति॑ । रक्षः॑ । बाध॑ते । परि॑ । अरा॑तीः । वरि॑वः । कृ॒ण्वन् । वृ॒जन॑स्य । राजा॑ ॥ ९.९७.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:97» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:12» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृजनस्य) बल का (राजा) प्रदीप्त करनेवाला परमात्मा (वरिवः) ऐश्वर्य्य को (कृण्वन्) करता हुआ (अरातीः) शत्रुरूप राक्षसों को (परिबाधते) नाश करता है और (इन्दुः) वह प्रकाशस्वरूप (वाजी) बलस्वरूप (गोन्योघाः) गतिशील (पवते) हमको पवित्र करता है और (सोमः) सोमस्वभाव (सहः) सहनशील परमात्मा (इन्द्रे) कर्मयोगी में (इन्वन्) शीलस्वभाव की प्रेरणा करता हुआ (मदाय) आनन्द के लिये उक्त गुणों का प्रदान करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - कर्म्मयोगी उद्योगी पुरुषों के सब विघ्नों की निवृत्ति करके परमात्मा कर्म्मयोगी के लिये आत्मभावों का प्रकाश करता है ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वृजनस्य राजा

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) = यह शक्तिशाली सोम वाजी हमें शक्तिशाली बनानेवाला होकर पवते प्राप्त होता है। यह (इन्द्रे) = जितेन्द्रिय पुरुष में (गोन्योघा:) = [गो नि ओघ] इन्द्रियों में निश्चय से प्राप्त होनेवाले रससमूहवाला है, इस सोम का ही रस सब इन्द्रियों में प्रवाहित होकर उन्हें शक्तिशाली बनाता है। यह (सोमः) = सोम (सहः) = बलकर रस को (इन्वन्) = प्रेरित करता हुआ (मदाय) = जीवन में उल्लास के लिये होता है । यह सोम (रक्षः) = रोगकृमियों को व राक्षसी भावों को (हन्ति) = नष्ट करता है। (अरातीः) = शत्रुओं को (परिबाधते) = हमारे से दूर ही रोकता है। यह सोम (वरिवः कृण्वन्) = वरणीय धनों को करता हुआ (वृजनस्य राजा) = बल को हमारे जीवनों में दीप्त करनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम शक्ति का संचार करता है। रोगकृमियों व मानस दुर्भावों का विनाश करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृजनस्य) बलस्य (राजा) दीपयिता परमात्मा (वरिवः) ऐश्वर्यं (कृण्वन्) उत्पादयन् (रक्षः, अरातीः) शत्रून् राक्षसान् (परि बाधते) नाशयति (इन्दुः) प्रकाशमयः स (वाजी) बलवान् (गोन्योघाः) गतिशीलः (पवते) मां पुनाति च (सोमः) सौम्यस्वभावः (सहः) सहनशीलः परमात्मा (इन्द्रे) कर्मयोगिनि (मदाय) आनन्दाय (हन्ति) विघ्नानि नाशयति (इन्वन्) तं प्रेरयति च ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indu, brilliant Soma, energetic and victorious, pure and purifying, vibrant and dynamic, creating strength, patience and endurance for the soul’s joy, is ever on the move. It destroys evil, prevents negativities and opposition and casts them far off, and, giving wealth, honour and excellence of the best order of our choice, rules as the brilliant creator, controller and dispenser of strength, courage, power and life saving vitality in existence.