वांछित मन्त्र चुनें

ब्र॒ह्मा दे॒वानां॑ पद॒वीः क॑वी॒नामृषि॒र्विप्रा॑णां महि॒षो मृ॒गाणा॑म् । श्ये॒नो गृध्रा॑णां॒ स्वधि॑ति॒र्वना॑नां॒ सोम॑: प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रेभ॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

brahmā devānām padavīḥ kavīnām ṛṣir viprāṇām mahiṣo mṛgāṇām | śyeno gṛdhrāṇāṁ svadhitir vanānāṁ somaḥ pavitram aty eti rebhan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ब्र॒ह्मा । दे॒वाना॑म् । प॒द॒ऽवीः । क॒वी॒नाम् । ऋषिः॑ । विप्रा॑णाम् । म॒हि॒षः । मृ॒गाणा॑म् । श्ये॒नः । गृध्रा॑णाम् । स्वऽधि॑तिः । वना॑नाम् । सोमः॑ । प॒वित्र॑म् । अति॑ । ए॒ति॒ । रेभ॑न् ॥ ९.९६.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:96» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:7» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (पवित्रम्) वज्रवाले को भी (रेभन्) शब्द करता हुआ अतिक्रमण कर जाता है। जिस प्रकार (गृध्राणाम्) “गृध्यति शश्वच्छेत्तुमभिकाङ्क्षति इति गृध्रः शस्त्रम्”। शस्त्रों के मध्य में (स्वधितिः) वज्र सबको अतिक्रमण कर जाता है और (मृगाणां श्येनः) शीघ्रगतिवाले पक्षियों में वाज और (विप्राणाम्, कवीनां, ऋषिः) विप्र और कविओं के मध्य में ऋषि सबको अतिक्रमण कर जाता है (देवानाम्) और विद्वानों के मध्य में (ब्रह्मा) ४ वेदों का वक्ता सबको अतिक्रमण कर जाता है, इसी प्रकार (पदवीः) सर्वोपरि उच्चपदरूप परमात्मा सब वस्तुओं में मुख्य है ॥६॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में कवि, विप्र, ब्रह्मादि मुख्य-२ शक्तियोंवाले पुरुषों का दृष्टान्त देकर परमात्मा की मुख्यता वर्णन की है ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्मा देवानाम्

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) = सोम (पवित्रम्) = पवित्र हृदय वाले पुरुष को (रेभन्) = स्तुति करता हुआ (अति एति) = अतिशयेन प्राप्त होता है। यह सोम ही स्तुति की वृत्ति को पैदा करता है। यह सोम (देवानां ब्रह्म) = देवों में ब्रह्मा है, सर्वप्रथम देव है । यह हमें देवों में श्रेष्ठतम बनाता है। (कवीनां पदवी:) = क्रान्तदर्शी ज्ञानियों का मार्गदर्शक है, अर्थात् कवियों का भी कवि है । (विप्राणां ऋषिः) = मेधावियों में ऋषि है, सोम उत्कृष्ट मेधा का जनक है। (मृगाणाम्) = आत्मान्वेषण करने वालों में (महिषः) = पूज्य है । (गृध्राणाम्) = विषयलोलुप इन्द्रियों का यह (श्येनः) = शंसनीय गतिवाला है । विषयलोलुप इन्द्रिय रूप गृध्रों के लिये यह श्येन हैं, उन्हें समाप्त करनेवाला 'बाज' है। यह इन्द्रियों की विषयलोलुपता को समाप्त करके उन्हें शंसनीय गतिवाला बनाता है । सोमरक्षण से इन्द्रियाँ विषयलोलुपता को छोड़कर शंसनीय गति वाली बनती हैं। यह सोम (वनानां स्वधितिः) = उपासकों में आत्मतत्व को धारण करनेवाला है। अथवा वासनावृक्ष के वनों का कुल्हाड़ा ही है, वासनाओं को छिन्न-भिन्न करके हृदय क्षेत्र को निर्मल करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम जीवन को श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर व श्रोष्ठतम बनाता चलता है। यह अन्ततः हमें 'ब्रह्मा' बना देता है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सर्वोत्पादकः परमात्मा (पवित्रं) वज्रिणमपि (रेभन्) शब्दायमानः (अति, एति) अतिक्रामति, यथा (गृध्राणां) शस्त्राणां मध्ये (स्वधितिः) वज्रनामशस्त्रं सर्वाण्यतिक्रामति (मृगाणां, श्येनः) यथा च शीघ्रगतिकपक्षिणां मध्ये श्येनः (विप्राणां, कवीनां, ऋषिः) विप्राणां कवीनां मध्ये ऋषिः (देवानां, ब्रह्मा) विदुषां मध्ये चतुर्णामपि वेदानामध्येता सर्वानतिक्रामति एवं हि (पदवीः) सर्वोच्चपदरूपः सोमः सर्वेषु वस्तुषु मुख्यः ॥६॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The Soma Spirit is Brahma, supreme over divinities, highest of the poets, divine seer among the wise, lion among the strongest animals, eagle among the birds of power, sword among the killers and, roaring and thundering, it goes forward, excels all others, and blesses the pure heart core of the soul.