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अ॒प॒घ्नन्ने॑षि पवमान॒ शत्रू॑न्प्रि॒यां न जा॒रो अ॒भिगी॑त॒ इन्दु॑: । सीद॒न्वने॑षु शकु॒नो न पत्वा॒ सोम॑: पुना॒नः क॒लशे॑षु॒ सत्ता॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apaghnann eṣi pavamāna śatrūn priyāṁ na jāro abhigīta induḥ | sīdan vaneṣu śakuno na patvā somaḥ punānaḥ kalaśeṣu sattā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒प॒ऽघ्नन् । ए॒षि॒ । प॒व॒मा॒न॒ । शत्रू॑न् । प्रि॒याम् । न । जा॒रः । अ॒भिऽगी॑तः । इन्दुः॑ । सीद॑न् । वने॑षु । श॒कु॒नः । न । पत्वा॑ । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । क॒लशे॑षु । सत्ता॑ ॥ ९.९६.२३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:96» मन्त्र:23 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:10» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:23


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (शत्रून्, अपघ्नन्) अन्यायकारी शत्रुओं को नाश करते हुए (एषि) आप सत्पुरुषों को प्राप्त होते हैं। (जारः, न) जारयतीति जारोऽग्निः, जैसे अग्नि (प्रियाम्) कमनीय कन्या को प्राप्त होकर उसे संस्कृत करता है, जिस प्रकार (अभिगीतः, इन्दुः) सत्कार द्वारा आह्वान किया हुआ ज्ञानयोगी (वनेषु, सीदन्) भक्तों में स्थिर होता हुआ उनको शान्ति प्रदान करता है और (शकुनः) विद्युत्शक्ति (न) जैसे (पत्वा) अपने प्रभाव को ढालकर उन्हें उत्तेजित करती है, इसी प्रकार (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ (कलशेषु) भक्त पुरुषों के अन्तःकरण में (सत्ता) स्थिर होता है ॥२३॥
भावार्थभाषाः - अन्य पदार्थ जीवात्मा का ऐसा संस्कार नहीं कर सकते, जैसा कि परमात्मा करता है अर्थात् परमात्मज्ञान के संस्कार द्वारा जीवात्मा सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥२३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शकुनः व पत्वा

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पवमानः) = पवित्र करनेवाले सोम ! (शत्रून्) = रोगकृमियों व काम-क्रोध आदि को (अपघ्नन् एषि) = नष्ट करता हुआ तू प्राप्त होता है। (जारः न) = एक स्तोता की तरह तू (प्रियाम्) = इस प्रभु की प्रिय वेदवाणी को [एषि] प्राप्त होता है। और अतएव (अभिगीत:) = स्तुति की वृत्ति वाला होता है और (इन्दुः) = हमें शक्तिशाली बनाता है [ इन्द् To be powerful ] (वनेषु) = उपासकों में (सीदन्) = स्थित होता हुआ तू (शकुनः न) = शक्तिशाली के समान (पत्वा) = निरन्तर गतिशील होता है। हमारे जीवनों को तू क्रियामय बनाता है। यह (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ (सोमः) = सोम कलशेषु (सत्ता) = शरीर कलशों में स्थित होनेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम शत्रुओं का विनाश करता है। हमें वेदवाणी की ओर झुकाता है। शक्तिशाली व क्रियाशील बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सर्वपावक ! (शत्रून्, अपघ्नन्) अन्यायकारिशत्रून्नाशयन् (एषि) सत्कर्मिणं प्राप्नोति भवान् (जारः) अग्निः (प्रियां, न) यथा कमनीयकन्यां प्राप्तः तां संस्करोति, यथा च (अभिगीतः, इन्दुः) सत्क्रियाभिराहूतः ज्ञानयोगी (वनेषु, सीदन्) भक्तेषु वर्तमानस्तेषु शमं वितनोति (शकुनः, न) यथा वा विद्युत् (पत्वा) स्वप्रभावेण पदार्थानुत्तेजयति एवं हि (सोमः) परमात्मा (पुनानः) सर्वान् पावयन् (कलशेषु) भक्तान्तःकरणेषु (सत्ता) स्थिरो भवति ॥२३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O spirit pure and purifying, you go forward bright and blissful, loving life, casting off and destroying enemy forces of negation and contradiction against life, moving like a lover cleansed by fire to meet his lady love, sitting in the hearts of lovers and admirers, flying like the eagle bird to its nest, and pure, exalted and edifying, abiding in the heart core of the celebrants.