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च॒मू॒षच्छ्ये॒नः श॑कु॒नो वि॒भृत्वा॑ गोवि॒न्दुर्द्र॒प्स आयु॑धानि॒ बिभ्र॑त् । अ॒पामू॒र्मिं सच॑मानः समु॒द्रं तु॒रीयं॒ धाम॑ महि॒षो वि॑वक्ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

camūṣac chyenaḥ śakuno vibhṛtvā govindur drapsa āyudhāni bibhrat | apām ūrmiṁ sacamānaḥ samudraṁ turīyaṁ dhāma mahiṣo vivakti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

च॒मू॒ऽसत् । श्ये॒नः । श॒कु॒नः । वि॒ऽभृत्वा॑ । गो॒ऽवि॒न्दुः । द्र॒प्सः । आयु॑धानि । बिभ्र॑त् । अ॒पाम् । ऊ॒र्मिम् । सच॑मानः । स॒मु॒द्रम् । तु॒रीय॑म् । धाम॑ । म॒हि॒षः । वि॒व॒क्ति॒ ॥ ९.९६.१९

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:96» मन्त्र:19 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:19


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अपामूर्मिम्) प्रकृति की सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियों के साथ (सचमानः) जो संगत है और (समुद्रम्) “सम्यग् द्रवन्ति भूतानि यस्मात् स समुद्रः” जिससे सब भूतों की उत्पत्ति स्थिति और प्रलय होता है, वह (तुरीयम्) चौथा (धाम) परमपद परमात्मा है, उसको (महिषः) “मह्यते इति महिषः”, महिष इति महन्नामसु नि. ३।१३। पठितम्। महापुरुष उक्त तुरीय परमात्मा का (विवक्ति) वर्णन करता है। वह परमात्मा (चमूसत्) जो प्रत्येक बल में स्थित है, (श्येनः) सर्वोपरि प्रशंसनीय है और (शकुनः) सर्वशक्तिमान् है। (गोविन्दुः) यजमानों को तृप्त करके जो (द्रप्सः) शीघ्र गतिवाला है (आयुधानि, बिभ्रत्) अनन्तशक्तियों को धारण करता हुआ इस संपूर्ण संसार का उत्पादक है ॥१९॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा इस विविध रचना का नियन्ता है। उसने अन्तरिक्षलोक को सम्पूर्ण भूतों के इतस्ततः भ्रमण का स्थान बनाया है ॥१९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'श्येनः शकुनः ' सोमः

पदार्थान्वयभाषाः - (चमूषत्) = द्यावापृथिवी में, मस्तिष्क व शरीर में आसीन होनेवाला सोम (श्येनः) = शंसनीय- गतिवाला है, विचारों की उत्तमता के कारण सदा उत्तम कर्मों वाला होता है। (शकुनः) = हमें शक्तिशाली बनाता हुआ (विभृत्वा) = विशेषरूप से हमारा भरण करता है । (गोविन्दुः) = ज्ञान की वाणियों को प्राप्त करनेवाला यह सोम (द्रप्सः) = हर्ष का कारण होता है । यह (आयुधानि) =' इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि' रूप आयुधों का (बिभ्रत्) = धारण करता है । (अपां ऊर्मिम्) = कर्मों के प्रेरक (समुद्रम्) = वेदवाणीरूप ज्ञानसमुद्र को (सचमानः) = सेवन करता हुआ (महिषः) = यह पूजा की वृत्ति वाला सोम (तुरीयं धाम) = 'जागरित स्वप्न सुषुप्ति' इन तीन से ऊपर समाधिजन्य तुरीय स्थिति को, योगानिद्रा को (विवक्ति) = हमारे जीवनों में व्यक्त करता है, हमारे जीवनों में हम इस सोमरक्षण से उस तुरीयावस्था का अनुभव करते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमें शंसनीयगतिवाला व शक्तिशाली बनाता हुआ अन्तः तुरीयावस्था को प्राप्त करानेवाला होता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अपाम्, ऊर्मिं) प्रकृतेः सूक्ष्मतमशक्तिभिः (सचमानः) सङ्गतः (समुद्रं) उत्पत्तिस्थितिप्रलयाश्रयः (तुरीयं, धाम) स चतुर्थधाम परमपदं परमात्मास्ति। (महिषः) महान् पुरुषः उक्ततुरीयपरमात्मानं (विवक्ति) वर्णयति स एव (चमूसत्) प्रत्येकबले सीदति (श्येनः) सर्वाधिकप्रशंसनीयः (शकुनः) सर्वशक्तिमान् (गोविन्दुः) उपास्यतर्पकः (द्रप्सः) द्रुतगतिः (आयुधानि, बिभ्रत्) अनन्तशक्तिं दधत् संसारस्योत्पादकः ॥१९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pervading every form of life and nature, adorable supreme Soma presence of divinity, abiding with stars and planets in motion, bearing infinite powers, vibrating with the waves of nature’s dynamics, vesting the cosmic structure, transcends to the fourth state of absolute bliss. Only the mighty sage speaks of the presence beyond speech.