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ऋषि॑मना॒ य ऋ॑षि॒कृत्स्व॒र्षाः स॒हस्र॑णीथः पद॒वीः क॑वी॒नाम् । तृ॒तीयं॒ धाम॑ महि॒षः सिषा॑स॒न्त्सोमो॑ वि॒राज॒मनु॑ राजति॒ ष्टुप् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛṣimanā ya ṛṣikṛt svarṣāḥ sahasraṇīthaḥ padavīḥ kavīnām | tṛtīyaṁ dhāma mahiṣaḥ siṣāsan somo virājam anu rājati ṣṭup ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋषि॑ऽमनाः । यः । ऋ॒षि॒ऽकृत् । स्वः॒ऽसाः । स॒हस्र॑ऽनीथः । प॒द॒ऽवीः । क॒वी॒नाम् । तृ॒तीय॑म् । धाम॑ । म॒हि॒षः । सिसा॑सन् । सोमः॑ । वि॒ऽराज॑म् । अनु॑ । रा॒ज॒ति॒ । स्तुप् ॥ ९.९६.१८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:96» मन्त्र:18 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:18


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सोमस्वरूप परमात्मा (सिषासन्) पालन की इच्छा करता हुआ (महिषः) जो महान् है, वह परमात्मा (तृतीयं, धाम) देवयान और पितृयान इन दोनों से पृथक् तीसरा जो मुक्तिधाम है, उसमें (विराजम्) विराजमान जो ज्ञानयोगी है, उसको (अनु, राजति) प्रकाश करनेवाला है और (स्तुप्) स्तूयमान है। (कवीनाम्, पदवीः) जो क्रान्तदर्शियों की पदवी अर्थात् मुख्य स्थान है और (सहस्रनीथः) अनन्त प्रकार से स्तवनीय है। (ऋषिमनाः) सर्वज्ञान के साधनरूप मनवाला वह परमात्मा (यः) जो (ऋषिकृत्) सब ज्ञानों का प्रदाता (स्वर्षाः) सूर्य्यादिकों का प्रकाशक है, वह जिज्ञासु के लिये उपासनीय है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों का नियन्ता है तथा मुक्तिधाम में विराजमान पुरुषों का भी नियन्ता है ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ऋषिमनाः ऋषिकृत्' सोमः

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋषिमनाः) = ऋषियों के मन के समान मन वाला (यः) = जो सोम है वह (ऋषिकृत्) = हमें ऋषि बनाता है (स्वर्षा:) = प्रकाश को प्राप्त कराता है, (सहस्रणीथः) [नीथाः स्तुतिः] ] शत स्तुतियों वाला है। हमें सदा प्रभुस्तवन की वृत्ति वाला बनाता है। (कवीनाम् पदवी:) = ज्ञानियों के मार्ग को कान्त बनाता है [वी - कान्ति] यह (महिषः) = [मह पूजयाम्] प्रभु पूजन की वृत्ति वाला (सोमः) = सोम (तृतीयं धाम) = 'प्रकृति व जीव' से ऊपर उठकर प्रभुरूप तृतीय स्थान को (सिषासन्) = [संभक्तुमिच्छून्] सेवित करने की इच्छा करता हुआ (स्तुप्) = काम-क्रोध-लोभ को रोकनेवाला [To stop] सोम (विराजं अनुराजति) = उस देदीप्यमान प्रभु के अनुसार दीप्ति वाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'ऋषि' बनाता है। प्रभु के समान दीप्ति वाला करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सोमस्वरूपः परमात्मा (सिषासन्) पालनेच्छां कुर्वन् (महिषः) सर्वपूज्यः (तृतीयं, धाम) देवयानपितृयानाभ्यां पृथक् तृतीये मुक्तिधाम्नि (विराजं) विराजन्तं ज्ञानयोगिनं (अनु, राजति) प्रकाशयति (स्तुप्) स्तूयमानश्चास्ति (कवीनां, पदवीः) क्रान्तदर्शिनां कवीनां मुख्यस्थानं चास्ति (सहस्रनीथः) सहस्रधा स्तवनीयः (ऋषिमनाः) सर्वज्ञानसाधनमनोयुक्तः सः (ऋषिकृत्) ज्ञानप्रदः (स्वर्षाः) सूर्यादिकानामपि प्रकाशकः। स एव जिज्ञासुभिः उपास्यः ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma is the presence that is the universal seer and poetic creator, maker of poets, exalted by sages, shower streams of bliss, adored a thousand ways for infinite power and glory, ultimate love and desire of poets, awful refulgence radiating to the third blazing space beyond the earthly and paradisal regions of life, the presence that mles and illuminates the heart and soul beyond the state of existential involvement, the one loving, blessing, beatific ultimate object of adoration and worship.