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स पू॒र्व्यो व॑सु॒विज्जाय॑मानो मृजा॒नो अ॒प्सु दु॑दुहा॒नो अद्रौ॑ । अ॒भि॒श॒स्ति॒पा भुव॑नस्य॒ राजा॑ वि॒दद्गा॒तुं ब्रह्म॑णे पू॒यमा॑नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa pūrvyo vasuvij jāyamāno mṛjāno apsu duduhāno adrau | abhiśastipā bhuvanasya rājā vidad gātum brahmaṇe pūyamānaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । पू॒र्व्यः । व॒सु॒ऽवित् । जाय॑मानः । मृ॒जा॒नः । अ॒प्ऽसु । दु॒दु॒हा॒नः । अद्रौ॑ । अ॒भि॒श॒स्ति॒ऽपाः । भुव॑नस्य । राजा॑ । वि॒दत् । गा॒तुम् । ब्रह्म॑णे । पू॒यमा॑नः ॥ ९.९६.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:96» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह (पूर्व्यः) अनादिसिद्ध परमात्मा (वसुवित्) सब धनों का नेता (जायमानः) जो सब जगह पर व्यापक है, (मृजानः) शुद्ध है, (अप्सु) कर्म्मों में (दुदुहानः) पूर्ण किया जाता है और (अद्रौ) सब प्रकार के संकटों में (अभिशस्तिपाः) शत्रुओं से रक्षा करनेवाला है, (भुवनस्य राजा) सब भुवनों का राजा है, (ब्रह्मणे पूयमानः) कर्म्मों में पवित्रता प्रदान करता हुआ (गातुम्) उपासकों के लिये (विदत्) पवित्रता प्रदान करता है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - शुद्धभाव से उपासना करनेवाले लोगों को परमात्मा सर्वप्रकार के ऐश्वर्य्य और पवित्रताओं का प्रदान करता है ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अभिशस्तिपाः

पदार्थान्वयभाषाः - भावार्थ- (स) = वह सोम (पूर्व्यः) = पालन व पूरण करने वालों में उत्तम है । (वसुवित्) = निवास के लिये आवश्यक सब तत्त्वों को प्राप्त करनेवाला है। (जायमानः) = शक्तियों के प्रादुर्भाव वाला है। (अप्सु मृजानः) = कर्मों में यह शुद्ध किया जाता है, अर्थात् हम कर्मों में लगे रहें, तो वासनाओं से बचे रहने से यह सोम मलिन नहीं हो पाता। (अद्रौ) = [one who adores] उपासक में यह (दुदुहान:) = प्रपूरित होता है। (अभिशस्तिपा) = हिंसक शत्रुओं से यह हमारा रक्षण करनेवाला है । (भुवनस्य राजा) = सब प्राणियों के जीवनों को यह दीप्त करनेवाला है । (पूयमानः) = पवित्र किया जाता हुआ यह सोम (ब्रह्मणे) = ब्रह्म प्राप्ति के लिये (गातुं) = मार्ग को (विदत्) = प्राप्त कराता है व उस मार्ग का ज्ञान देता है । एवं यह सोम हमें अन्ततः ब्रह्म को प्राप्त करानेवाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'कर्मशीलता व उपासना' सोमरक्षण के साधन हैं, रक्षित सोम हमारा पूरण करता हुआ, शत्रुओं से बचाता हुआ, हमें ब्रह्म की ओर ले चलता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) स एव (पूर्व्यः) अनादिसिद्धः परमात्मा (वसुवित्) सर्वधनानां नेता (जायमानः) यः सर्वत्र व्याप्नोति (मृजानः) शुद्धः (अप्सु) कर्मसु (दुदुहानः) पूरितो भवति (अद्रौ) सर्वसङ्कटेषु (अभिशस्तिपाः) शत्रुतो रक्षकः (भुवनस्य, राजा) सर्वलोकानां शासकः (ब्रह्मणे, पूयमानः) कर्मसु पवित्रतां प्रददत् (गातुं) उपासकाय (विदत्) पवित्रतां प्रददाति ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, eternal spirit, master sustainer of the world and its wealth, universally manifestive, adored and exalted, distilled in the cloud and envisioned in thought and action, protector from evil and calumny, ruler and sustainer of the universe, knower and revealer of the paths to divinity is realised in purity and illumined in spiritual yajna of meditation for the attainment of the vision of eternity.