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सं मा॒तृभि॒र्न शिशु॑र्वावशा॒नो वृषा॑ दधन्वे पुरु॒वारो॑ अ॒द्भिः । मर्यो॒ न योषा॑म॒भि नि॑ष्कृ॒तं यन्त्सं ग॑च्छते क॒लश॑ उ॒स्रिया॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sam mātṛbhir na śiśur vāvaśāno vṛṣā dadhanve puruvāro adbhiḥ | maryo na yoṣām abhi niṣkṛtaṁ yan saṁ gacchate kalaśa usriyābhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । मा॒तृऽभिः॑ । न । शिशुः॑ । वा॒व॒शा॒नः । वृषा॑ । द॒ध॒न्वे॒ । पु॒रु॒ऽवारः॑ । अ॒त्ऽभिः । मर्यः॑ । न । योषा॑म् । अ॒भि । निः॒ऽकृ॒तम् । यन् । सम् । ग॒च्छ॒ते॒ । क॒लशे॑ । उ॒स्रिया॑भिः ॥ ९.९३.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:93» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:3» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषा) कर्मयोगी जो (पुरुवारः) बहुत लोगों को वरणीय है, वह (अद्भिः) सत्कर्मों द्वारा (दधन्वे) धारण किया जाता है। जो कर्म्मयोगी (वावशानः) परमात्मा की कामनावाला है और (मातृभिः) अपनी इन्द्रियवृत्तियों से (शिशुः) सूक्ष्म करनेवाले के (न) समान (संदधन्वे) धारण करता है, (न) जिस प्रकार (योषां) स्त्री को (मर्य्यः) मनुष्य धारण करता है, इस प्रकार (उस्रियाभिः) ज्ञान की शक्तियों के द्वारा कर्म्मयोगी परमात्मा की विभूतियों को धारण करता है और जो परमात्मा (निष्कृतं) ज्ञान का विषय हुआ (कलशे) उस कर्म्मयोगी के अन्तःकरण में (संगच्छते) प्राप्त होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार ऐश्वर्य्यप्रद प्रकृतिरूपी विभूति को उद्योगी पुरुष धारण करता है, इसी प्रकार प्रकृति की नानाशक्तिरूप विभूति को कर्मयोगी पुरुष धारण करता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अद्भिः संदधन्वे, उस्त्रियाभिः संगच्छते

पदार्थान्वयभाषाः - (वावशान:) = दिव्य गुणों की कामना करता हुआ, (वृषा) = शक्ति का सेचन करनेवाला, (पुरुवार:) = पालक व पूरक वरणीय वस्तुओंवाला सोम (अद्भिः) = कर्मों के द्वारा इस प्रकार (संदधन्वे) = धारण किया जाता है (न) = जैसे कि (मातृभिः) = माताओं से (शिशुः) = एक सन्तान । निरन्तर कर्मों में लगे रहना ही सोमरक्षण का उपाय है। रक्षित सोम हमारे अन्दर दिव्य गुणों का धारण करता है और हमारे में शक्ति का सेचन करता है। (न) = जैसे (मर्यः) = एक मनुष्य (योषाम् अभि) = स्त्री की ओर जाता है, उसी प्रकार यह सोम (कलशे) = इस शरीर में (निष्कृतं) = परिष्कृत हृदय की ओर (यन्) = जाता हुआ (उस्त्रियाभिः) = प्रकाशों के साथ संगच्छते संगत होता है। सोम के कारण जीवन प्रकाशमय हो उठता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- कर्मों में लगे रहने से सोम का धारण होता है और धारित सोम जीवन को प्रकाशमय बना देता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषा) कर्मयोगी यः (पुरुवारः) अनेकजनैः वरणीयः सः (अद्भिः) सत्कर्मभिः (दधन्वे) धार्यते। यः कर्मयोगी (वावशानः) परमात्मविषयककामनावान् तथा (मातृभिः) स्वेन्द्रियवृत्तिभिः (शिशुः, न) सूक्ष्मकर्तेव (सं, दधन्वे) धारयति (न) यथा (योषां) स्त्रियं (मर्यः) मनुष्यः धारयति तथैव (उस्रियाभिः) ज्ञानशक्तिद्वारा कर्मयोगी परमात्मविभूतीर्धारयति। तथा यः परमात्मा (निष्कृतं) ज्ञानविषयो भवन् (कलशे) तस्य कर्मयोगिनोऽन्तःकरणे सङ्गच्छते प्राप्नोति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a child fulfilled and secure with mother’s and grandmother’s love, the loving Soma, generous treasure home of universal gifts of life, fulfils the celebrant with showers of pranic energy and, like a lover meeting his lady love, blesses his consecrated heart, and therein vibrates with the dedicated soul with divine radiations of light in thought, word and deed.