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तन्नु स॒त्यं पव॑मानस्यास्तु॒ यत्र॒ विश्वे॑ का॒रव॑: सं॒नस॑न्त । ज्योति॒र्यदह्ने॒ अकृ॑णोदु लो॒कं प्राव॒न्मनुं॒ दस्य॑वे कर॒भीक॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tan nu satyam pavamānasyāstu yatra viśve kāravaḥ saṁnasanta | jyotir yad ahne akṛṇod u lokam prāvan manuṁ dasyave kar abhīkam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत् । नु । स॒त्यम् । पव॑मानस्य । अ॒स्तु॒ । यत्र॑ । विश्वे॑ । का॒रवः॑ । स॒म्ऽनस॑न्त । ज्योतिः॑ । यत् । अह्ने॑ । अकृ॑णोत् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । प्र । आ॒व॒त् । मनु॑म् । दस्य॑वे । कः॒ । अ॒भीक॑म् ॥ ९.९२.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:92» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:2» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानस्य) जो सबको पवित्र करनेवाला परमात्मा है, उसका (सत्यं) सत्य का स्थान (नु) निश्चय करके (तत् अस्तु) वह है, (यत्र) जिसमें (विश्वे) सब (कारवः) उपासक (सन्नसन्त) संगत होते हैं। (अह्ने) प्रकाश के लिये (यत्) जो (ज्योतिः) ज्योति है (उ) और (लोकमकृणोत्) जो ज्योति ज्ञानरूप प्रकाश को उत्पन्न करती है और (मनुं) विज्ञानी पुरुष की (प्रावत्) रक्षा करती है, उस ज्योति से (दस्यवे) अज्ञानी, असंस्कारी वा अवैदिक पुरुष के लिये (अभीकं) निर्भयता (कः) कौन कर सकता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा के सद्रूप का वर्णन किया और उक्त परमात्मा को सब ज्योतियों का प्रकाशक माना है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण व प्रभु प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानस्य) = पवित्र करनेवाले सोम का (नु) = अब (तत्) = वह सर्वव्यापक [तनु विस्तारे] (सत्यं) = सत्यस्वरूप प्रभु (अस्तु) = हो, (यत्र) = जिसमें विश्वे सब (कारवः) = स्तोता लोग (संनसन्त) = संगत होते हैं। जिस प्रभु को स्तोता लोग प्राप्त करते हैं, उसे वस्तुतः यह सोम ही उन्हें प्राप्त कराता है। वह परमात्मा इस सोम का होता है, अर्थात् सोमरक्षण से प्राप्त होता है (यत्) = जो (अह्ने) = दिन के लिये (लोकं ज्योतिः) = प्रकाशक ज्योति को (अकृणोत्) = करता है, (मनुं प्रावत्) = ज्ञानशील मनुष्य का रक्षण करता है और इस ज्ञानी मनुष्य को (दस्यवे) = दास्यव वृत्तियों के लिये (अभीकं कः) = आक्रमण करनेवाला करता है। इस प्रभु को हम सोमरक्षण के द्वारा ही प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- स्तोताओं को प्राप्त होनेवाला प्रभु वस्तुतः सोमरक्षण के द्वारा ही प्राप्त होता है। ये प्रभु हमारे लिये सूर्य के प्रकाश को करते हैं। ज्ञानी पुरुष का रक्षण करते हैं, और उसे दास्यव वृत्तियों पर आक्रमण करनेवाला बनाते हैं।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानस्य) यः सर्वेषां पवित्रयिता परमात्मास्ति तस्य (सत्यं) सत्यस्थानं (नु) निश्चयं (तत्, अस्तु) तदस्ति (यत्र) यस्मिन् (विश्वे) सर्वे (कारवः) उपासकाः (सन्नसन्त) सङ्गता भवन्ति (अह्ने) प्रकाशकाय (यत्) यत् (ज्योतिः) ज्योतिरस्ति (उ) तथा च (लोकं, अकृणोत्) यज्ज्योतिः प्रकाशमुत्पादयति (मनुं) विज्ञानिपुरुषञ्च (प्र, आवत्) रक्षति, तस्माज्ज्योतिषः (दस्यवे) अज्ञानिनम्, असंस्कारिणम्, अवैदिकं वा पुरुषं (अभीकं) भयरहितं (कः) कः कर्तुं शक्नोति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - True it is of Soma, pure and purifying, Truth itself of Soma, wherein all basic causes of existence converge, merge and integrate: Soma it is who created the sun and light of knowledge for the day and enlightenment, which protects the man of thought and knowledge, which for the ignorant lost in darkness is but a distant possibility or even a cause for collision.