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तव॒ त्ये सो॑म पवमान नि॒ण्ये विश्वे॑ दे॒वास्त्रय॑ एकाद॒शास॑: । दश॑ स्व॒धाभि॒रधि॒ सानो॒ अव्ये॑ मृ॒जन्ति॑ त्वा न॒द्य॑: स॒प्त य॒ह्वीः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tava tye soma pavamāna niṇye viśve devās traya ekādaśāsaḥ | daśa svadhābhir adhi sāno avye mṛjanti tvā nadyaḥ sapta yahvīḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तव॑ । त्ये । सो॒म॒ । प॒व॒मा॒न॒ । नि॒ण्ये । विश्वे॑ । दे॒वाः । त्रयः॑ । ए॒का॒द॒शासः॑ । दश॑ । स्व॒धाभिः॑ । अधि॑ । सानौ॑ । अव्ये॑ । मृ॒जन्ति॑ । त्वा॒ । न॒द्यः॑ । स॒प्त । य॒ह्वीः ॥ ९.९२.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:92» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वे देवाः) सम्पूर्ण देव जो (त्रयः, एकादशासः) ३३ हैं, वे (निण्ये) अन्तरिक्ष में वर्तमान हैं। (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (त्ये) वे (तव) तुम्हारे लिये (दश) पाँच सूक्ष्म भूत और पाँच स्थूल भूतों की (स्वधाभिः) सूक्ष्मशक्तियों द्वारा (अधिसानौ) तुम्हारे सर्वोपरि उच्चस्वरूप में (अव्ये) जो सर्वरक्षक हैं, उसमें (मृजन्ति) संशोधन करनेवाले हैं और (त्वां) तुझको (सप्त, यह्वीः, नद्यः) जो बड़ी सात नाड़ियाँ हैं, उनके द्वारा प्राप्त होते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में योगविद्या का वर्णन किया है और सप्तनद्यः से तात्पर्य सात प्रकार की नाड़ियों का है, जिनको इड़ा, पिङ्गलादि नामों से कथन किया जाता है। तात्पर्य यह है कि योगी पुरुष उक्त नाड़ियों के द्वारा संयम करके परमात्मयोगी बनें अर्थात् परमात्मा में युक्त हों ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्वदेवा धिष्ठानता

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (पवमानः) = जीवन को पवित्र बनानेवाले ! (तव) = तेरे (निण्ये) = अन्तर्हित होने पर रुधिर में अदृश्य रूप से व्याप्त होने पर (त्ये) = वे (त्रयः एकादशासः) = तीन गुणा ग्यारह, अर्थात् पृथिवीस्थ ग्यारह, अन्तरिक्षस्थ ग्यारह और द्युलोकस्थ ग्यारह, ये तेतीस (विश्वेदेवाः) = सब देव शरीर में स्थित होते हैं। सोमरक्षण के होने पर शरीर में सब देवों की स्थिति होती है। (अव्ये) = अपना रक्षण करनेवाले में उत्तम पुरुष में (दश) = दस इन्द्रियाँ (स्वधाभिः) = आत्मधारण शक्तियों के द्वारा (अधि सानो) = शिखर प्रदेश में, मस्तिष्क रूप द्युलोक में (त्वा मृजन्ति) = तेरा शोधन करती हैं। वासनाओं से अपने को बचानेवाला पुरुष इन्द्रियों को अपने-अपने कार्य में लगाये रखता है और परिणामतः सोम की ऊर्ध्वगति होकर मस्तिष्क रूप द्युलोक में ज्ञानाग्नि का दीपन होता है । इस स्थिति में (सप्त) = सात छन्दों में प्रवाहित होनेवाली और अतएव सात (यह्वीः) = महान् (नद्यः) = ज्ञान की नदियाँ इस सोम को (मृजन्ति) = अतिशयेन शुद्ध कर डालती हैं। वेद चार हैं, सात छन्दों में होने से इन्हें यहाँ सात नदियों के रूप में कहा है। इन सात नदियों में स्नान करने पर सोम भी परिशुद्ध हो जाता है। ज्ञान के द्वारा वासनाओं का भस्मीकरण होकर सोम का शुद्ध होना स्वाभाविक ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम के शरीर में व्याप्त होने पर यह शरीर सर्वदेवाधिष्ठान बनता है । सोम की परिशुद्धि के लिये इन्द्रियों को स्वकार्यतत्पर व ज्ञान प्राप्ति में लगाये रखना आवश्यक है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वे, देवाः) सर्वे देवाः (त्रयः, एकादशासः) त्रयस्त्रिंशत्सङ्ख्याकाः सन्ति ते (निण्ये) अन्तरिक्षे विद्यन्ते (सोम) हे सर्वोत्पादकपरमात्मन् ! (त्ये) ते (तव) तुभ्यं (दश) पञ्चानां सूक्ष्मभूतानां पञ्चानां स्थूलभूतानां च (स्वधाभिः) सूक्ष्माभिः शक्तिभिः (अधि, सानौ) त्वदीये सर्वश्रेष्ठे स्वरूपे (अव्ये) यत्खलु सर्वपालकं विद्यते तस्मिन् (मृजन्ति) संशोधयन्ति अपि च (त्वां) त्वां (सप्त, यह्वीः, नद्यः) याः किल बृहत्तराः सप्त नाड्यः सन्ति, ताभिः प्राप्नुवन्ति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, vibrant omnipresent spirit of life, pure and purifying, all those thirty three divinities of existence, for sure, integrate in the mysterious depth of your presence. Ten pranas, ten subtle and gross elements of nature and seven mighty constant streams of existence at the cosmic and microcosmic levels with their own oblations serve, adore and glorify you on top of the protected and protective world of existence.