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प्र सु॑मे॒धा गा॑तु॒विद्वि॒श्वदे॑व॒: सोम॑: पुना॒नः सद॑ एति॒ नित्य॑म् । भुव॒द्विश्वे॑षु॒ काव्ये॑षु॒ रन्तानु॒ जना॑न्यतते॒ पञ्च॒ धीर॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra sumedhā gātuvid viśvadevaḥ somaḥ punānaḥ sada eti nityam | bhuvad viśveṣu kāvyeṣu rantānu janān yatate pañca dhīraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । सु॒ऽमे॒धाः । गा॒तु॒ऽवित् । वि॒श्वऽदे॑वः । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । सदः॑ । ए॒ति॒ । नित्य॑म् । भुव॑त् । विश्वे॑षु । काव्ये॑षु । रन्ता॑ । अनु॑ । जना॑न् । य॒त॒ते॒ । पञ्च॑ । धीरः॑ ॥ ९.९२.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:92» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:2» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुमेधाः) शोभन प्रज्ञावाला और (गातुवित्) मार्ग के जाननेवाला (विश्वदेवः) जिसका ज्ञान सर्वत्र विद्यमान है, (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (पुनानः) सबको पवित्र करता हुआ परमात्मा (नित्यं) सदैव (सदः) उस स्थान को (एति) प्राप्त होता है, जिस स्थान में (विश्वेषु काव्येषु) सम्पूर्ण प्रकार की रचनाओं में (रन्ता) रमण करनेवाला योगी (पञ्चधीरः) पाँच प्रकार के (जनान्) प्राणों को (अनुयतते) लगाता है और लगाकर अर्थात् प्राणायाम करके (भुवत्) रमणशील होता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - योगी पुरुष प्राणायाम द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करता है, इसी अभिप्राय से यह कथन किया है कि योगी को परमात्मा प्राप्त होता है। वास्तव में परमात्मा सर्वव्यापक है, उसका जाना-आना कहीं नहीं होता ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमेधा गातुवित् विश्वदेव

पदार्थान्वयभाषाः - यह (सुमेधाः) = उत्तम मेधा को पैदा करनेवाला [शोभना मेधा यस्मात्], (गातुवित्) = मार्ग को जाननेवाला, सदा मार्ग का उपदेश करनेवाला, (विश्वदेवः) = सब दिव्यगुणों को विकसित करनेवाला (सोमः) = सोम (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ (नित्यं) = सदा (सदः एति) = अपने घर की ओर आता है, अर्थात् शरीर में ही स्थित होता है। शरीर में स्थित होने पर यह सोम (विश्वेषु काव्येषु) = सब ज्ञानों में (रन्ता) = रमण करनेवाला (भुवत्) = होता है। तथा (धीरः) = बुद्धि को प्रेरित करनेवाला यह सोम (पञ्चजनान्) = पाँच भागों में विभक्त सारे समाज के (अनुयतते) = अनुकूल यत्नवाला होता है। सोम का रक्षण करनेवाला मनुष्य समाज विरोधी क्रियाओंवाला नहीं होता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम के रक्षित होने पर मनुष्य उत्तम बुद्धिवाला, मार्ग का ज्ञाता, दिव्यगुण सम्पन्न, ज्ञान में रमण करनेवाला, अविरुद्ध क्रियाओंवाला होता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुमेधाः) शोभनप्रज्ञावान्, अपि च (गातुवित्) मार्गज्ञः (विश्वदेवः) यस्य ज्ञानं सर्वत्र विद्यते (सोमः) सर्वोत्पादकः परमात्मा (पुनानः) सर्वाञ्जनान् पवित्रयन् (नित्यं) सदैव (सदः) तस्मिन् स्थाने (एति) प्राप्नोति यस्मिन्स्थाने (विश्वेषु, काव्येषु) सर्वप्रकारास्वपि रचनासु (रन्ता) रमणकर्त्ता योगी (पञ्चधीरः) पञ्चविधान् (जनान्) प्राणान् (अनु, यतते) युनक्ति योजयित्वा च प्राणायामं विधाय (भुवत्) रमणशीलो भवति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, Spirit of divine intelligence, knowing all ways of the earthly world, universal refulgent generous giver, pure and purifying power, always moves and takes its divine seat in the heart core of the soul and on the yajnic grass of the vedi. Rejoicing in all intellectual and poetic holy meets of the world and, inspiring the constant spirit of steady wisdom and resolution, it joins the five orders of universal humanity and exhorts them together to move forward on the common way to collective progress.