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रु॒जा दृ॒ळ्हा चि॑द्र॒क्षस॒: सदां॑सि पुना॒न इ॑न्द ऊर्णुहि॒ वि वाजा॑न् । वृ॒श्चोपरि॑ष्टात्तुज॒ता व॒धेन॒ ये अन्ति॑ दू॒रादु॑पना॒यमे॑षाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

rujā dṛḻhā cid rakṣasaḥ sadāṁsi punāna inda ūrṇuhi vi vājān | vṛścopariṣṭāt tujatā vadhena ye anti dūrād upanāyam eṣām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रु॒जा । दृ॒ळ्हा । चि॒त् । र॒क्षसः॑ । सदां॑सि । पु॒ना॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । ऊ॒र्णु॒हि॒ । वि । वाजा॑न् । वृ॒श्च । उ॒परि॑ष्टात् । तु॒ज॒ता । व॒धेन॑ । ये । अन्ति॑ । दू॒रात् । उ॒प॒ऽना॒यम् । ए॒षा॒म् ॥ ९.९१.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:91» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:1» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - और वह कर्म्मयोगी (रक्षसः) राक्षसों की (दृळ्हा सदांसि) दृढ़ सभाओं को (चित्) भी (रुजा) अपनी नाशक शक्ति से नष्ट कर देता है और (विवाजान्) न्यायकारी बलयुक्त पुरुषों की शक्तियों को (इन्दो) हे प्रकाशमान परमात्मन् ! तुम (ऊर्णुहि) आच्छादन करो और (उपरिष्टात्) जो ऊपर की ओर से आते हैं अथवा (दूरात्) दूर देश से जो आते हैं, (एषां) इन राक्षसों के (उपनायं) स्वामी को (तुजता वधेन) तीक्ष्ण वध से नाश करो ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष शम-दमादि साधनसम्पन्न होकर परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनके सब विघ्नों को दूर करता है और उनके विघ्नकारी राक्षसों का दमन करके उनके मार्ग को सुगम करता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'रक्षः सदो-विनाश'

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्दो) = सोम ! (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ तू (रक्षसः) = राक्षसों की, राक्षसी भावों की (दृढाचित्) = बड़ी दृढ़ भी (सदांसि) = नगरियों को आवास स्थानों को (रुजः) = छिन्न-भिन्न कर । काम ने इन्द्रियों में, क्रोध ने मन में तथा लोभ ने बुद्धि में जो किले बनाये हैं, उन्हें तू तोड़नेवाला बन । हे सोम ! (वाजान्) = हमारे बलों को (वि ऊर्णुहि) = सम्यक् आच्छादित रख। ये बल शत्रुओं से विनष्ट न कर दिये जायें। ये जो भी शत्रु (उपरिष्टात्) = ऊपर से (ये अन्ति) = जो समीपदेश से (दूरात्) = दूर से हमारे पर आक्रमण करते हैं, उन्हें (वृश्च) = काट डाल । (एषाम्) = इन शत्रुओं के (उपनायम्) = वेता को (तुजतावधेन) = हिंसक आयुध से विनष्ट कर काम-क्रोध आदि शत्रुओं का मुखिया यह काम ही है, इस काम को तू विनष्ट करनेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से सब राक्षसी भावों का विनाश होकर हमारे बलों का रक्षण होता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - अपि च स कर्मयोगी (रक्षसः) राक्षसानां (दृळ्हा, सदांसि) दृढसमितीः (चित्) अपि (रुजा) आत्मीयनाशकशक्त्या विनाशयति, अपि च (विवाजान्) न्यायकारिणां बलशालिनां पुरुषाणां शक्तीः (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूपपरमात्मन् ! त्वं (ऊर्णुहि) आच्छादय, किञ्च (उपरिष्टात्) उपरिष्टात् (ये, दूरात्) दूरदेशाद्वागच्छन्ति (एषां) एषां राक्षसानां (उपनायं) स्वामिनं (तुजता, वधेन) तीक्ष्णेन शस्त्रेण विनाशय ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of power, break down the strongholds of demonic destroyers. Pure, purifying and consecrated, cover the forces of positive strength of creativity. Uproot the saboteurs and the destroyers coming from above, break with the bolt those who are far off or near within, destroy their leaders.