पदार्थान्वयभाषाः - (दिव्यस्य जनस्य) = दिव्यगुण युक्त मनुष्यों के (वीती) = [प्रजनन] विकास के लिये (कव्यैः) = स्तुतिशील (नहुष्येभिः) = मनुष्यों से (अधि सुवानः) = उत्पन्न किया जाता हुआ यह (इन्दुः) = सोम है। प्रभु का सवन करनेवाले लोग इस सोम को अपने अन्दर उत्पन्न करते हैं, और इसके रक्षण के द्वारा वे एक 'दिव्यजन' का विकास करते हैं, अर्थात् अपने जीवन को दिव्य बना पाते हैं। (यः) = जो सोम (मर्त्येभिः) = मनुष्यों से (प्र मर्मृजान:) = खूब शुद्ध किया जाता हुआ, वासना के उबाल से रहित किया हुआ (अमृत:) = अमृतत्त्व का कारण बनता है। यह सोम (नृभिः) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले पुरुषों से तथा (अविभिः) = वासनाओं से अपना रक्षण करनेवाले पुरुषों से (गोभिः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा तथा (अद्भिः) = कर्मों के द्वारा [अप-कर्म] शुद्ध किया जाता है। सोम को रक्षित करने के लिये आवश्यक है कि हम प्रगतिशील बनें [नृभिः], वासनाओं से अपना रक्षण करें [अविभिः], ज्ञान की वाणियों को अपनायें [गोभिः] सदा उत्तम कर्मों में लगे रहें [अद्भिः] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्तोता लोग सोम का शरीर में रक्षण करके जीवन को दिव्य बनाते हैं । इसके रक्षण के लिये आवश्यक है कि हम स्वाध्याय व यज्ञादि उत्तम कर्मों में लगे रहें ।