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ए॒वा राजे॑व॒ क्रतु॑माँ॒ अमे॑न॒ विश्वा॒ घनि॑घ्नद्दुरि॒ता प॑वस्व । इन्दो॑ सू॒क्ताय॒ वच॑से॒ वयो॑ धा यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā rājeva kratumām̐ amena viśvā ghanighnad duritā pavasva | indo sūktāya vacase vayo dhā yūyam pāta svastibhiḥ sadā naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । राजा॑ऽइव । क्रतु॑ऽमान् । अमे॑न । विश्वा॑ । घनि॑घ्नत् । दुः॒ऽइ॒ता । प॒व॒स्व॒ । इन्दो॒ इति॑ । सु॒ऽउ॒क्ताय॑ । वच॑से । वयः॑ । धाः॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥ ९.९०.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:90» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:6 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (राजेव) आप सबको प्रदीप्त करनेवाले और सर्वस्वामी हैं। (क्रतुमान्) कर्मों के अधिष्ठाता हैं (विश्वा, अमेन) सम्पूर्ण बल से (दुरिता, घनिघ्नत्) समस्त पापों को दूर करते हुए (पवस्व) हमको पवित्र करें। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (सूक्ताय, वचसे) सुन्दर वाणियों के कथन करने को (वयोधाः) ऐश्वर्य देनेवाले (यूयं) आप (स्वस्तिभिः) कल्याणकारी भावों से (सदा) सदैव (नः) हमको (पात) पवित्र करें ॥६॥
भावार्थभाषाः - इसमें परमात्मा से कल्याण की प्रार्थना की गई है ॥६॥ यह ९० वाँ सूक्त और २६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राजा इव

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! (एवा) = [इ गतौ] अपनी गतिशीलता से (राजा इव) = राजा की तरह (क्रतुमान्) = शक्ति व कर्मोंवाला तू (अमेन) = अपने बल से (विश्वा दुरिता) = सब दुरितों को, पापों को (घनिघ्नत्) = विनष्ट करता हुआ (पवस्व) = प्राप्त हो । सोम शरीर के अंग-प्रत्यंग में गतिवाला होकर उन सब अंगों को दुरित शून्य करके हमारे जीवन को सुन्दर बनाता है। हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! तू हमें (सूक्ताय वचसे) = मधुर भाषण के लिये (वयः धाः) = उत्कृष्ट जीवन को धारण करानेवाला हो । सोमरक्षण से मनुष्य सदा शुभ शब्दों को बोलने की वृत्तिवाला बनता है, यह आपे को खोकर नहीं बोलने लगता । हे सोमकणो ! (यूयम्) = तुम (स्वस्तिभिः) = उत्तम स्थितियों के द्वारा सदा हमेशा (न पात) = हमारा रक्षण करो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमारे जीवन को इस प्रकार परिशुद्ध बनाता है, जैसे कि एक राजा राष्ट्र को । यह परिशुद्ध जीवनवाला व्यक्ति तत्त्वद्रष्टा ज्ञानी बनता है। यह 'कश्यप' नामवाला होता है- पश्यक = द्रष्टा । यही अगले सूक्त का ऋषि है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! त्वं (राजेव) सर्वप्रकाशकः सर्वस्वामी चासि (क्रतुमान्) कर्मणामधिष्ठातासि (विश्वा, अमेन) सम्पूर्णेन बलेन (दुरिता, घनिघ्नत्) सर्वाण्यपि पापानि दूरीकुर्वन्, त्वं (पवस्व) अस्मान् पवित्रय (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूपपरमात्मन् ! (सूक्ताय, वचसे) शोभनानां वाणीनामभिधानाय (वयोधाः) ऐश्वर्यं धेहि (यूयम्) त्वम्, (स्वस्तिभिः) कल्याणकारिभिर्भावैः (सदा) सदैव (नः) अस्मान् (पात) रक्ष ॥६॥ इति नवतितमं सूक्तं षड्विंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus like a brilliant ruler, presiding power of universal action and human endeavour, pray flow on and purify us with your divine powers destroying all evils and undesirables of the world. O lord of refulgence and life’s joy, bless us with good health and long age for the sake of holy speech and grateful songs of adoration. O divinities of heaven and earth, pray bless us with all time peace, progress and all round happiness and well being.