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उ॒रुग॑व्यूति॒रभ॑यानि कृ॒ण्वन्त्स॑मीची॒ने आ प॑वस्वा॒ पुरं॑धी । अ॒पः सिषा॑सन्नु॒षस॒: स्व१॒॑र्गाः सं चि॑क्रदो म॒हो अ॒स्मभ्यं॒ वाजा॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

urugavyūtir abhayāni kṛṇvan samīcīne ā pavasvā puraṁdhī | apaḥ siṣāsann uṣasaḥ svar gāḥ saṁ cikrado maho asmabhyaṁ vājān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒रुऽग॒व्यूतिः । अभ॑यानि । कृ॒ण्वन् । स॒मी॒ची॒ने इति॑ स॒म्ऽई॒ची॒ने । आ । प॒व॒स्व॒ । पुर॑न्धी॒ इति॒ पुर॑म्ऽधी । अ॒पः । सिसा॑सन् । उ॒षसः॑ । स्वः॑ । गाः । सम् । चि॒क्र॒दः॒ । म॒हः । अ॒स्मभ्य॑म् । वाजा॑न् ॥ ९.९०.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:90» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऊरु गव्यूतिः) विस्तृत मार्गोंवाले आप (समीचीने) धर्म की राह में (अभयानि कृण्वन्) अभय प्रदान करते हुए (आपवस्व) हमको पवित्र करें। आप (पुरुन्धी) सम्पूर्ण संसार के धारण करनेवाले हैं और (अपः) शुभ कर्मों की (सिषासन्) शिक्षा करते हुए (उषसः) उषाकाल की (स्वर्गाः) रश्मियों को (संचिक्रदः) अपने वैदिक शब्दों से विस्तृत करते है। (महः) हे सर्वपूज्य परमात्मन् ! (अस्मभ्यं) हमको (वाजान्) बलों को दें ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मा के उपदेश किये हुए शुभमार्गों पर चलते हैं, परमात्मा उनको शुभमार्गों की प्राप्ति कराता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समीचीने पुरन्धी

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! (उरुगव्यूतिः) = विशाल मार्गवाला, अर्थात् हमें विशालता की ओर ले चलनेवाला तू (अभयानि कृण्वन्) = निर्भयता को करता हुआ (समीचीने) = साथ- साथ गतिवाले (पुरन्धी) = उत्तम धारक द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (आपवस्व) = प्राप्त कराता । सोमरक्षण द्वारा हमारा मस्तिष्क व शरीर उत्तम बने। ये दोनों साथ-साथ विकसित शक्तिवाले हों। (अपः) उत्तम कर्मों के (सिषासन्) = सेवन की इच्छावाला होता हुआ तू (उषसः) = [उष दाहे] दोष दहनों को, (स्वः) = प्रकाश को (गाः) = ज्ञान की वाणियों को और (महः वाजान्) = महनीय बलों को (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (संचिक्रदः) = आहूत कर, इन बातों को हमारे लिये प्राप्त करानेवाला हो । सोमरक्षण से हम उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, हमारे दोष दग्ध होते हैं, प्रकाश प्राप्त होता है, ज्ञान की वाणियों व शक्तियों का लाभ होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से मस्तिष्क व शरीर का साथ-साथ विकास होता है। उत्तम कर्म ज्ञान व शक्ति प्राप्त होती है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उरु, गव्यूतिः) विस्तृतमार्गवांस्त्वं (समीचीने) धर्म्ममार्गे (अभयानि, कृण्वन्) अभयं प्रददन् (आ, पवस्व) मां पवित्रय। त्वं (पुरन्धी) सर्वजगद्धारकोऽसि। अपि च (अपः) शुभकर्म्माणि (सिषासन्) शिक्षयन् (उषसः) प्रातःकालस्य (स्वर्गाः) किरणान् (सञ्चिक्रदः) निजवैदिकशब्दैर्विस्तारयसि। (महः) हे सर्वपूज्यपरमात्मन् ! (अस्मभ्यं) अस्माकं (वाजान्) बलानि देहि ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Bountiful bearer of the abundant world of heaven and earth, creating and clearing the wide paths of truth and rectitude, making them free from fear and mutual conflict, enlightening us on the dynamics of karma in the flow of existence, expanding heavenly lights of the dawns of successive days, pray speak loud and bold and clear and bring us great victories of sustenance, power, honour and excellence in the struggle for progress in a state of purity.