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शूर॑ग्राम॒: सर्व॑वीर॒: सहा॑वा॒ञ्जेता॑ पवस्व॒ सनि॑ता॒ धना॑नि । ति॒ग्मायु॑धः क्षि॒प्रध॑न्वा स॒मत्स्वषा॑ळ्हः सा॒ह्वान्पृत॑नासु॒ शत्रू॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śūragrāmaḥ sarvavīraḥ sahāvāñ jetā pavasva sanitā dhanāni | tigmāyudhaḥ kṣipradhanvā samatsv aṣāḻhaḥ sāhvān pṛtanāsu śatrūn ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शूर॑ऽग्रामः । सर्व॑ऽवीरः । सहा॑वान् । जेता॑ । प॒व॒स्व॒ । सनि॑ता । धना॑नि । ति॒ग्मऽआ॑यु॑धः । क्षि॒प्रऽध॑न्वा । स॒मत्ऽसु॑ । अषा॑ळ्हः । स॒ह्वान् । पृत॑नासु । शत्रू॑न् ॥ ९.९०.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:90» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शूरग्रामः) जो शूरवीरों के समुदायवाले हैं (सर्ववीरः) और स्वयं भी सब प्रकार से वीर हैं और (सहावान्) धैर्यवान् हैं तथा (जेता) सबको जीतनेवाले हैं (धनानि सनिता) और जो ऐश्वर्य्योपार्जन में लगे हुए हैं, उनको आप (पवस्व) पवित्र करें। आप (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शस्त्रोंवाले हैं और (क्षिप्रधन्वा) शीघ्रगतिवाले हैं और (समत्सु) संग्राम में (अषाळ्हः) पर शक्ति को न सहनेवाले हैं और (पृतनासु) पर सेना में (साह्वान्) धुरन्धर (शत्रून्) शत्रुओं के (जेता) जीतनेवाले हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - यहाँ परमात्मा का रुद्रधर्म का निरूपण किया। रुद्रधर्म को धारण करनेवाला परमात्मा वीरों के अनन्त सङ्घों में शक्ति उत्पन्न करके संसार से पाप की निवृत्ति करता है। उस अनन्त शक्तियुक्त परमात्मा के अतितीक्ष्ण शस्त्र हैं, जिससे वह अन्यायकारियों की सेना को विदीर्ण करता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अषाढः साह्वान्' सोमः

पदार्थान्वयभाषाः - (धनानि सनिता) = सब अन्नमय आदि कोशों के ऐश्वर्यों का दाता सोम ! तू (पवस्व) = हमें प्राप्त है। तू (शूरग्रामः) = शूर समूहोंवाला हो, 'पञ्चप्राण, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ' आदि सब समूह इस सोम के द्वारा शूर बनते हैं । (सर्ववीरः) = सब को वीर बनानेवाला यह सोम है। (सहावान्) = बलवाला (जेता) = सदा विजयी है। (तिग्मायुधः) = ' इन्द्रियों, मन व बुद्धि' रूप आयुधों को तेज बनानेवाला है । (क्षिप्रधन्वा) = शत्रुओं को सुदूर प्रेरित करनेवाले 'प्रणव' रूप धनुषवाला है । सोमरक्षक पुरुष प्रभु को ही अपना धनुष बनाता है और काम-क्रोध आदि शत्रुओं को परे फेंकता है। (समत्सु) = संग्रामों में (अषाढः) = शत्रुओं से पराभूत नहीं होता, (प्रतनासु) = शत्रु सैन्यों में शत्रून् शत्रुओं को (साह्वान्) = पराभूत करनेवाला है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सोम हमें वीर बनाता है। सब शत्रुओं का पराभव करता हुआ यह सदा अपराजित है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शूरग्रामः) यः शूरवीराणां स्वामी (सर्ववीरः) स्वयमपि सर्वप्रकारेण वीरश्चास्ति अपि च (सहावान्) धैर्य्यवान् (जेता) तथा सर्वजेता अस्ति (धनानि सनिता) यश्चैश्वर्योपार्जने लग्नः तं (पवस्व) त्वं रक्ष। त्वं (तिग्मायुधः) तीक्ष्णशस्त्रवान् (क्षिप्रधन्वा) शीघ्रगतिश्चासि। अन्यच्च (समत्सु) सङ्ग्रामे (अषाळ्हः) परशक्त्यसहनशीलः, (पृतनासु) प्रधानसेनाया (सह्वान्) धुरन्धराणां (शत्रूणां) रिपूणाञ्जेता चासि ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Commander of a multitude of heroes, himself brave in every way, patient and mighty, all time victor, generous giver of all wealth, honour and excellence, wielding weapons of instant light and fire power, unconquerable in contests of values and destroyer of the enemy in battles of arms, may we pray, flow and purify us.