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अ॒भि वह्नि॒रम॑र्त्यः स॒प्त प॑श्यति॒ वाव॑हिः । क्रिवि॑र्दे॒वीर॑तर्पयत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi vahnir amartyaḥ sapta paśyati vāvahiḥ | krivir devīr atarpayat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । वह्निः॑ । अम॑र्त्यः । स॒प्त । प॒श्य॒ति॒ । वाव॑हिः । क्रिविः॑ । दे॒वीः । अ॒त॒र्प॒य॒त् ॥ ९.९.६

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:9» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:33» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:6


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जो (अमर्त्यः) मृत्युरहित है (वह्निः) प्रकाशमान है (वावहिः) जो सबका प्रेरक है (सप्त, देवीः) भूम्यादि सात प्रकृतियें (अतर्पयत्) जिसका वर्णन करती हैं, (क्रिविः) जो सद्गुणों से भरा हुआ है, वह (पश्यति) सबको अपनी ज्ञानदृष्टि से देखता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा महत्त्वादि सात प्रकार की प्रकृतियों से अलंकृत किया हुआ है और जिसको धारणा ध्यानादि बुद्धि की सात वृत्तियें विषय करती हैं, वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है, एकमात्र उसी परमात्मा की उपासना करनी चाहिये ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'क्रिवि' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वह्निः) = हमें जीवन में सफलता से आगे-आगे ले चलनेवाला, (अमर्त्यः) = हमें रोगों से बचानेवाला, (वावहि:) = हमारे कार्यभारों का सम्यक् वहन करनेवाला यह सोम (सप्त) = शरीरयज्ञ के संचालक सातों होताओं को 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्', कानों, नासिका, छिद्रों, आँखों व मुख को अभिपश्यति अच्छी प्रकार देखता है, सोम इनको सुरक्षित रखता है, सोमरक्षण से इनकी शक्ति बढ़ती है । [२] (क्रिविः) = [Doing, performing] सब कार्यों को सम्यक् करता हुआ तथा विरोधी तत्त्वों का विनाश करता हुआ यह सोम (देवी:) = ज्ञान प्राप्ति की साधनभूत इन इन्द्रियों को (अतर्पयत्) = प्रीणित करता है । सोमरक्षण से ये इन्द्रियाँ प्रवृद्ध शक्तिवाली बनती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम इन्द्रियों की शक्ति का वर्धन करता है । सोम शरीर के सब कार्यों का संचालन करता है और रोगकृमियों का विनाश करता है ।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अमर्त्यः) यो मृत्युरहितः (वह्निः) प्रकाशमानश्च (वावहिः) यश्च सर्वेषां प्रेरकः (सप्त, देवीः) भूम्यादिसप्त देव्यः (अतर्पयत्) यं वर्णयन्ति (क्रिविः) यः सर्वसद्गुणपूर्णः सः (पश्यति) सर्वान् स्वज्ञानदृष्ट्या ईक्षते ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The enlightened soul, immortal and inviolable, user and inspirer of its human mind and sense, whom seven modes of Prakrti and seven pranas define in the existential state, overwatches the seven and, generous like a fount of nectar, fulfills all the seven, i.e., when they have fulfilled their function he retires them, and they resolve into their mother source of Prakrti.