409 बार पढ़ा गया
ता अ॒भि सन्त॒मस्तृ॑तं म॒हे युवा॑न॒मा द॑धुः । इन्दु॑मिन्द्र॒ तव॑ व्र॒ते ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tā abhi santam astṛtam mahe yuvānam ā dadhuḥ | indum indra tava vrate ||
पद पाठ
ताः । अ॒भि । सन्त॑म् । अस्तृ॑तम् । म॒हे । युवा॑नम् । आ । द॒धुः॒ । इन्दु॑म् । इ॒न्द्र॒ । तव॑ । व्र॒ते ॥ ९.९.५
409 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:9» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:32» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:5
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमैश्वर्यशालि परमात्मन् ! (तव, व्रते) तुम्हारे व्रत की पूर्ति के लिये (इन्दुम्) जीवात्मा को (युवानम्) जो नित्य नूतन है (सन्तम्) सत्कर्मी (अस्तृतम्) जो अच्छेद्य है, उसको (ताः) वे (अभि) भली-भाँति योगजबुद्धिवृत्तियें (महे) महत्त्व की प्राप्ति के लिये (आदधुः) धारण करती हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - कर्मयोगी पुरुष अपने निष्काम कर्म द्वारा उस तत्त्व को प्राप्त होता है, जिसको योग में एकतत्त्वाभ्यास लिखा है अर्थात् उस तत्त्व की प्राप्ति के लिये कर्मयोगी होना आवश्यक है ॥५॥३२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'सन् अस्तृत युवा' सोम
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ताः) = वे गत मन्त्र में वर्णित धीतियाँ [ध्यानवृत्तियाँ] (सन्तम्) = श्रेष्ठ (अस्तृतम्) = अहिंसित (युवानाम्) = बुराइयों को हमारे से दूर करनेवाले और अच्छाइयों को हमारे से मिलानेवाले सोम को महे महत्त्व की प्राप्ति के लिये (अभि आदधुः) = द्यावापृथिवी में स्थापित करती हैं, मस्तिष्क में [ द्यावा में] यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और पृथिवी में [शरीर में] रोगकृमियों के विनाश का कारण बनता है। ज्ञान व स्वास्थ्य के द्वारा यह हमारे जीवन को (सन्) = श्रेष्ठ व (अस्तृत) = अहिंसित बनाता है । [२] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (तव व्रते) = तेरे व्रत में (इन्दुम्) = इस सोम को वे ध्यान वृत्तियाँ शरीर में स्थापित करनेवाली होती हैं। जब मनुष्य जितेन्द्रियता का व्रत लेता है तभी वस्तुतः वह ध्यानवृत्तिवाला बन पाता है। इस ध्यान वृत्तियों से वह सोम का शरीर में रक्षण करनेवाला बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - व्रतमय जीवन के द्वारा शरीर में सुरक्षित सोम हमारी 'श्रेष्ठता, अहिंसा व निर्दोषत्व' का कारण बनता है।
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परमैश्वर्यशालि परमात्मन् ! (तव, व्रते) तव व्रतस्य पूर्तये (इन्दुम्) जीवात्मानं (युवानम्) नित्यं यौवनसम्पन्नं (सन्तम्) सत्कर्माणम् (अस्तृतम्) अच्छेद्यं (ताः) ता योगजबुद्धिवृत्तयः (महे) महत्त्वलाभाय (अभि) सम्यक् (आदधुः) दधति ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of light and joy, those seven mental and spiritual stages of divine perception and reception direct the joyous soul, which is ever existent, ever young and inviolable, to abide in the great discipline of your divine law.
