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स स॒प्त धी॒तिभि॑र्हि॒तो न॒द्यो॑ अजिन्वद॒द्रुह॑: । या एक॒मक्षि॑ वावृ॒धुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa sapta dhītibhir hito nadyo ajinvad adruhaḥ | yā ekam akṣi vāvṛdhuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । स॒प्त । धी॒तिऽभिः॑ । हि॒तः । न॒द्यः॑ । अ॒जि॒न्व॒त् । अ॒द्रुहः॑ । याः । एक॑म् । अक्षि॑ । व॒वृ॒धुः ॥ ९.९.४

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:9» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:4


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह परमात्मा (सप्त, नद्यः) इडा, पिङ्गलादि सात नाड़ियों को “नदन्तीति नद्यः” (धीतिभिः) ‘धीयते सर्वकर्मसु इति धीतिर्बुद्धिः’ जब बुद्धि की वृत्तियों से (हितः) धारण किया जाता है, तो (अजिन्वत्) योग द्वारा तृप्त करता है (याः, अद्रुहः) जो नाड़ियें स्वकर्तव्य पालन करती हुयी (एकम्, अक्षि) उस एक अविनाशी परमात्मा को (वावृधुः) प्रकाशित करती हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में योगविद्या का वर्णन किया गया है, भाव यह है कि जब पुरुष अपने प्राणायाम द्वारा इडा पिङ्गलादि नाडियों को तृप्त कर देता है, तो वह उस अभ्यास से एकाग्रचित्त होकर अविनाशी परमात्मा के भाव को अनुभव करता है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

एकं अक्षि-अद्वितीय सर्वद्रष्टा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम (सप्त धीतिभिः) = सात ध्यानवृत्तियों के द्वारा 'कानों, नासिका छिद्रों, आँखों व मुख' इन सातों को अन्तर्मुखी वृत्तिवाला करने के द्वारा (हितः) = शरीर में स्थापित हुआ- हुआ (नद्यः) = ज्ञान की नदियों को (अजिन्वत्) = प्रीणित करता है। इन ज्ञान की नदियों को प्रीणित करके यह (अद्रुहः) = द्रोह से रहित होता है, किसी भी प्रकार हमारा विनाश नहीं होने देता। [२] इस सोम [वीर्य] द्वारा प्रीणित हुई हुई ये ज्ञान नदियाँ वे होती हैं (याः) = जो कि (एकं अक्षि) = उस अद्वितीय सर्वद्रष्टा प्रभु को (वावृधुः) = हमारे में बढ़ाती हैं। इन ज्ञानों को प्राप्त करके हम प्रभु को सर्वद्रष्टा के रूप में अनुभव करने लगते हैं। इस प्रकार यह सोम हमें हिंसित होने से बचाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - 'कान, नासिका, चक्षु, जिह्वा' इन सभी को अन्तर्मुखी वृत्तिवाला बनाकर हम सोम का रक्षण करते हैं। रक्षित सोम से ज्ञान की नदियों का प्रवाह चलता है। ये हमें हिंसित होने से बचाती हैं। इनके द्वारा हम प्रभु को सर्वद्रष्टा के रूप में अनुभव करते हैं।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) स परमात्मा (सप्त, नद्यः) इडापिङ्गलादिसप्तनाडीः, यदा (धीतिभिः) बुद्धिवृत्तिभिः (हितः) गृहीतो भवति तदा (अजिन्वत्) योगेन तर्पयति (याः, अद्रुहः) याः स्वकर्तव्यं पालयन्त्यः (एकम्, अक्षि) केवलं तमव्ययं परमात्मानं (वावृधुः) प्रकटयन्ति ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He, exhilarating divine consciousness, is received through seven stages of mental and spiritual realisation and, thus realised, sets seven streams of individual consciousness, negativities eliminated, aflow which reveal the exalting presence of the one universal light of existence.