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प्रप्र॒ क्षया॑य॒ पन्य॑से॒ जना॑य॒ जुष्टो॑ अ॒द्रुहे॑ । वी॒त्य॑र्ष॒ चनि॑ष्ठया ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pra-pra kṣayāya panyase janāya juṣṭo adruhe | vīty arṣa caniṣṭhayā ||
पद पाठ
प्रऽप्र॑ । क्षया॑य । पन्य॑से । जना॑य । जुष्टः॑ । अ॒द्रुहे॑ । वी॒ती । अ॒र्ष॒ । चनि॑ष्ठया ॥ ९.९.२
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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:9» मन्त्र:2
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:32» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:2
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (पन्यसे) जो पुरुष कर्मयोगी है तथा (अद्रुहे) जो किसी के साथ द्वेष नहीं करता (जनाय) ऐसे मनुष्य के हृदय में आप (प्र प्र, क्षयाय) अत्यन्त विराजमान होते हैं (च) और (वीती) उसकी तृप्ति के लिये (चनिष्ठया, जुष्टः) ऐश्वर्य की धारा से संयुक्त होकर (अर्ष) ऐश्वर्य देवें ॥२॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि परमात्मा सर्वव्यापक है, तथापि ऐश्वर्य के प्रदाता होकर उन्हीं पुरुषों के हृदय में विराजमान हो रहा है, जो पुरुष कर्मयोगी और रागद्वेष से रहित है, इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह राग-द्वेष के भाव से रहित होकर निष्कामभाव से सदैव कर्मयोग में लगा रहे ॥२॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'उत्तम-स्तुतिमय-विकसित-द्रोहशून्य' जीवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! तू (चनिष्ठया वीती) = [चन: अन्नं] अत्यन्त सात्त्विक अन्न के भक्षण से (अर्ष) = हमें प्राप्त हो । सात्त्विक अन्न के सेवन से उत्पन्न हुआ हुआ सोम शरीर में सुरक्षित रहता है। यह सुरक्षित सोम (प्रप्र क्षयाय) = अत्यन्त उत्कृष्ट निवास के लिये होता है । [२] यह (पन्यसे) = उत्तम स्तुतिमय जीवन का कारण बनता है। (जुष्टः) = सेवित हुआ हुआ (जनाय) = शक्तियों के विकास के लिये होता है, तथा (अद्रुहे) = न द्रोह के लिये होता है । सोमरक्षक पुरुष के जीवन में 'इर्ष्या-द्वेष- क्रोध' के लिये स्थान नहीं होता ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सात्त्विक अन्न का सेवन सोमरक्षण के लिये अनुकूल होता है। रक्षित सोम जीवन को 'उत्तम, स्तुतिमय, विकसित, द्रोहशून्य' बनाता है । ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा । देवता- पवमानः सोमः ॥ छन्दः - गायत्री ॥
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (पन्यसे) कर्मयोगिणे (अद्रुहे) सर्वस्य हितं कुर्वते च (जनाय) मनुष्याय हितं कर्तुं तद्हृदये भवान् (प्र प्र, क्षयाय) नितान्तं विराजते (च) तथा (वीती) तत्तृप्तये (चनिष्ठया जुष्टः) ऐश्वर्यधारया संयुतः सन् (अर्ष) प्रयच्छैश्वर्यम् ॥२॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, loved and cherished of all, ever move with love and favours of grace to every home and every region of the world for the celebrant and all men free from jealousy and enmity, and bless them all with joy and life’s fulfilment.
