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चत॑स्र ईं घृत॒दुह॑: सचन्ते समा॒ने अ॒न्तर्ध॒रुणे॒ निष॑त्ताः । ता ई॑मर्षन्ति॒ नम॑सा पुना॒नास्ता ईं॑ वि॒श्वत॒: परि॑ षन्ति पू॒र्वीः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

catasra īṁ ghṛtaduhaḥ sacante samāne antar dharuṇe niṣattāḥ | tā īm arṣanti namasā punānās tā īṁ viśvataḥ pari ṣanti pūrvīḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

चत॑स्रः । ई॒म् । घृ॒त॒ऽदुहः॑ । स॒च॒न्ते॒ । स॒मा॒ने । अ॒न्तः । ध॒रुणे॑ । निऽस॑त्ताः । ताः । ई॒म् । अ॒र्ष॒न्ति॒ । नम॑सा । पु॒ना॒नाः । ताः । ई॒म् । वि॒श्वतः॑ । परि॑ । स॒न्ति॒ । पू॒र्वीः ॥ ९.८९.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:89» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:25» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चतस्रः) पृथिवी, जल, तेज और वायु की चारों शक्तियें (ईं) इस परमात्मा को जो (घृतदुहः) स्नेह के दोहन करनेवाली हैं, वे (सचन्ते) संगत होती हैं। (समाने धरुणे) एक अधिकरण में (अन्तः निषत्ताः) व्याप्य-व्यापकता का सम्बन्ध रखकर (ताः) वे शक्तियें (ईं) इस परमात्मा को (अर्षन्ति) प्राप्त होती हैं। (नमसा) ऐश्वर्य्य से (पुनानाः) पवित्र करती हुई (ताः) वे शक्तियें (पूर्वीः) जो अनन्त हैं, वे (ईं) इस परमात्मा को (परिषन्ति) सर्व ओर से विभूषित करती हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - प्रकृति की परमाणुरूप शक्तियों से ईश्वर का ऐश्वर्य विभूषित हो रहा है। इन सब शक्तियों का केन्द्र एकमात्र परमात्मा ही है। उसी एकमात्र परब्रह्म में ये उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करती हैं अर्थात् आविर्भाव का नाम उत्पत्ति और सूक्ष्मरूप से विराजमान होने का नाम प्रलय है ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण व वेदज्ञान

पदार्थान्वयभाषाः - प्रभु सब के समान रूप से धारण करनेवाले हैं, सो वे 'समान धरुण' कहे गये हैं । वेदवाणियों का आधार भी वे प्रभु हैं । उस (समाने धरुणे अन्तः) = उस सब के आधारभूत प्रभु में (निषत्ता:) = स्थित (चतस्र) = चारों (घृतदुहः) = ज्ञानदीप्ति का दोहन करनेवाली वेदवाणियाँ (ईम्) = निश्चय से (सचन्ते) = इस सोम के साथ समवेत होती हैं। अर्थात् सोमरक्षण के होने पर ज्ञान की वाणियाँ प्राप्त होती हैं। (ताः) = वे वेदवाणियाँ (ईम्) = निश्चय से (नमसा) = नम्रता से (पुनानाः) = पवित्र करती हुई (अर्षन्ति) = प्राप्त होती हैं। सोमरक्षण के होने पर वेदवाणियाँ प्राप्त होती हैं। ये ज्ञान की वाणियाँ हमें नम्र बनाती हैं और हमें पवित्र करती हैं। (ताः) = वे (पूर्वी:) = सृष्टि के प्रारम्भ में दी जानेवाली अथवा हमारा पालन व पूरण करनेवाली वेदवाणियाँ (ईम्) = निश्चय से (विश्वतः) = सब प्रकार से (परिषन्ति) = [To conquer] इसके जीवन में वासनाओं को परिभूत करती हैं और ये वेदवाणियाँ ही [To guide, govern] इसके जीवन का शासन करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हमारे जीवन में वेदवाणियाँ उपस्थित होती हैं, उनके अनुसार ही हमारा जीवन चलता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चतस्रः) पृथिव्यप्तेजोवायूनां चतस्रः शक्तयः (ईं) अमुं परमात्मानं (घृतदुहः) याः स्नेहदोग्ध्र्यः सन्ति, ताः (सचन्ते) सङ्गच्छन्ति (समाने, धरुणे) एकस्मिन्नधिकरणे (अन्तः, निषत्ताः) व्याप्यव्यापकतायाः सम्बन्धं स्वीकृत्य (ताः) पूर्वोक्ताः शक्तयः (ईम्) अमुं परमात्मानं (अर्षन्ति) प्राप्नुवन्ति। (नमसा) ऐष्वर्येण (पुनानाः) पवित्रयन्त्यः (ताः) ताः शक्तयः (पूर्वीः) या अनन्ताः सन्ति, ताः (ईं) अमुं परमात्मानं (परि, सन्ति) सर्वतो विभूषयन्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Four eternal powers in existence, cooperative, creative, and gracious, abiding and integrated with and within the one, united, uniform and all integrative systemic soma spirit of the cosmic, social and individual order of life, pure, purifying and strengthening it with obedience and sustaining energy, move to the central master spirit, all time stay around and serve it for the continuance of life in existence.$(In the cosmic system, the four are earth, water, fire and air in time and space. In the social order, they are the four classes: intellectuals, teachers and researchers; rulers, administrators and organisers of defence and law and order of peace and justice system; producers and distributors in the economic system; and the support services.) At the individual level, they are mana (mind and senses), buddhi (intelligence and discrimination), chitta (memory), and ahankara (I- sense).