पदार्थान्वयभाषाः - (द्रप्स:) = [दृपी हर्षणे:] आनन्द का कारणभूत यह सोम (सिन्धूनां राजा) = ज्ञान प्रवाहों का दीप्त करनेवाला है, (वासः अवसिष) = ज्ञानवस्त्र का धारण करानेवाला है। यह सोम ही (रजिष्ठाम् ऋजुतम) = सरलता से युक्त (ऋतस्य नावम्) = यज्ञ की नाव का (अरुहत्) = आरोहण करता है। यह हमारे जीवन को सत्यमय सरल बनाता हुआ यज्ञिय बनाता है। यह सोम (अप्सु) = कर्मों में (वावृधे) = वृद्धि को प्राप्त करता है, अर्थात् कर्मशीलता इसके रक्षण का साधन बनता है। (श्येनजूतः) = शंसनीय गतिवाले से यह शरीर में प्रेरित होता है । अर्थात् उत्तम कर्मों में लगे रहना ही शरीर में सोम को व्याप्त करने का साधन है । (ईम्) = इस सोम को (पिता) = वासनाओं से अपना रक्षण करनेवाला व्यक्ति (ईम्) = ही (दुहे) = अपने में प्रपूरित करता है। (पितुः जाम्) = सर्वरक्षक पिता प्रभु के प्रादुर्भाव करनेवाले, प्रभु साक्षात्कार के कारणभूत इस सोम को पिता = वासनाओं से अपना रक्षण करनेवाला ही (ईम्) = निश्चय से (दुहे) = अपने में प्रपूरित करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें ज्ञानदीप्ति को प्राप्त कराता है । हमें यज्ञिय वृत्तिवाला बनाता है । इसके रक्षण के लिये आवश्यक है कि हम कर्मों में लगे रहकर वासनाओं से अपने को आक्रान्त न होने दें।