पदार्थान्वयभाषाः - आत्मज्ञान यदि 'समुद्र' है- 'स+मुद्' अद्भुत आनन्द को देनेवाला है, तो विज्ञान अपने नाना रूपों [नद्यः] नदियों के समान है। शरीर में सुरक्षित सोम 'राजा' जीवन को दीप्त करनेवाला है, यह (समुद्रं) = ज्ञान समुद्र को तथा नद्यः - विज्ञान की नदियों को विगाहते विलोड़ित करता है । सुरक्षित सोम ज्ञान-विज्ञान को बढ़ानेवाला होता है । यह (अपाम्) = कर्मों की (ऊर्मिम्) = [row, line] पंक्ति को (सचते) = सेवन करता है, अर्थात् सोम हमें शक्ति देकर कर्त्तव्य कर्मों के पूर्ण करने के योग्य बनाता है । यह (सिन्धुषु श्रितः) = यहाँ ज्ञान-विज्ञान की नदियों में आशय करता है, अथवा 'स्यन्दन्ते', निरन्तर क्रियाशील पुरुषों में यह स्थिर होकर रहता है। यह (पवमानः) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला सोम (अव्ययम् सानु) = अविनाशी ज्ञान - शिखर पर (अध्यस्थात्) = स्थित होता है । यह (पृथिव्याः नाभा) = [ अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः] पृथिवी के केन्द्रभूत यज्ञों में स्थित होता है तथा (महः दिवः धरुणः) = महान् स्तुति [दिव् स्तुतौ] का धारण करनेवाला है। यह सोम हमें 'ज्ञानी - यज्ञशील व स्तोता' बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें ज्ञानी यज्ञ आदि कर्मों में प्रवृत्त तथा साधन की वृत्तिवाला बनाता है।