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राजा॑ समु॒द्रं न॒द्यो॒३॒॑ वि गा॑हते॒ऽपामू॒र्मिं स॑चते॒ सिन्धु॑षु श्रि॒तः । अध्य॑स्था॒त्सानु॒ पव॑मानो अ॒व्ययं॒ नाभा॑ पृथि॒व्या ध॒रुणो॑ म॒हो दि॒वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

rājā samudraṁ nadyo vi gāhate pām ūrmiṁ sacate sindhuṣu śritaḥ | adhy asthāt sānu pavamāno avyayaṁ nābhā pṛthivyā dharuṇo maho divaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

राजा॑ । स॒मु॒द्रम् । न॒द्यः॑ । वि । गा॒ह॒ते॒ । अ॒पाम् । ऊ॒र्मिम् । स॒च॒ते॒ । सिन्धु॑षु । श्रि॒तः । अधि॑ । अ॒स्था॒ट् सानु॑ । पव॑मानः । अ॒व्यय॑म् । नाभा॑ । पृ॒थि॒व्याः । ध॒रुणः॑ । म॒हः । दि॒वः ॥ ९.८६.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जो परमात्मा (पृथिव्याः) पृथिवीलोक और (महो दिवः) इस बड़े द्युलोक का (धरुणः) आधार है। (पवमानः) सबको पवित्र करनेवाला परमात्मा (नद्यः) सब समृद्धिओं को और (अव्ययं समुद्रम्) इस अविनाशी अन्तरिक्ष को (वि गाहते) विगाहन करता है। (अपामूर्मिम्) जल की लहरें-रूप नदियों को (सिन्धुषु) महासागरों में (सचते) संगत करता है। (श्रितः) वह सबका आश्रय होकर (अध्यस्थात्) विराजमान हो रहा है और (सानु नाभा) उच्च से उच्च शिखरों के मध्य में भी विराजमान है ॥८॥
भावार्थभाषाः - यद्यपि स्थूल दृष्टि से ये पृथिव्यादिलोक अन्य पदार्थों के अधिष्ठान प्रतीत होते हैं, तथापि सर्वाधिष्ठान एक मात्र परमात्मा ही है, क्योंकि सब लोक-लोकान्तरों की रचना करनेवाला और नदियों को सागरों के साथ संगत करनेवाला और ग्रह-उपग्रहों को सूर्य्यादि बड़ी-बड़ी ज्योतियों में संगत करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही सबका अधिष्ठान है, कोई अन्य वस्तु नहीं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महो दिवः धरुणः

पदार्थान्वयभाषाः - आत्मज्ञान यदि 'समुद्र' है- 'स+मुद्' अद्भुत आनन्द को देनेवाला है, तो विज्ञान अपने नाना रूपों [नद्यः] नदियों के समान है। शरीर में सुरक्षित सोम 'राजा' जीवन को दीप्त करनेवाला है, यह (समुद्रं) = ज्ञान समुद्र को तथा नद्यः - विज्ञान की नदियों को विगाहते विलोड़ित करता है । सुरक्षित सोम ज्ञान-विज्ञान को बढ़ानेवाला होता है । यह (अपाम्) = कर्मों की (ऊर्मिम्) = [row, line] पंक्ति को (सचते) = सेवन करता है, अर्थात् सोम हमें शक्ति देकर कर्त्तव्य कर्मों के पूर्ण करने के योग्य बनाता है । यह (सिन्धुषु श्रितः) = यहाँ ज्ञान-विज्ञान की नदियों में आशय करता है, अथवा 'स्यन्दन्ते', निरन्तर क्रियाशील पुरुषों में यह स्थिर होकर रहता है। यह (पवमानः) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला सोम (अव्ययम् सानु) = अविनाशी ज्ञान - शिखर पर (अध्यस्थात्) = स्थित होता है । यह (पृथिव्याः नाभा) = [ अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः] पृथिवी के केन्द्रभूत यज्ञों में स्थित होता है तथा (महः दिवः धरुणः) = महान् स्तुति [दिव् स्तुतौ] का धारण करनेवाला है। यह सोम हमें 'ज्ञानी - यज्ञशील व स्तोता' बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें ज्ञानी यज्ञ आदि कर्मों में प्रवृत्त तथा साधन की वृत्तिवाला बनाता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - यः परमात्मा (पृथिव्याः) पृथिवीलोकस्य अपि च (महः, दिवः) अस्य महतो द्युलोकस्य (धरुणः) आधारोऽस्ति। (पवमानः) सर्वं पवित्रयन् परमात्मा (नद्यः) सर्वाः समृद्धीः अपि च (अव्ययं, समुद्रं) अविनाशिमन्तरिक्षं (वि, गाहते) विगाहनं करोति (अपां, ऊर्मिं) जलतरङ्गरूपनदीः (सिन्धुषु) महासागरेषु (सचते) सङ्गताः करोति (श्रितः) स सर्वस्याश्रयो भूत्वा (अधि, अस्थात्) विराजते। अपि च (सानु, नाभा) अत्युच्चशिखराणामपि मध्ये विराजते ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Shining and ruling it plunges and rolls in the oceans of space and plays with the currents of winds. It joins the waves of floods of water and waxes with the seas. Pure, purifying and flowing, it rises on top of imperishable existence. It is the centre-hold of the universe and mighty foundation of the heavens of light.