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अ॒ग्रे॒गो राजाप्य॑स्तविष्यते वि॒मानो॒ अह्नां॒ भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः । हरि॑र्घृ॒तस्नु॑: सु॒दृशी॑को अर्ण॒वो ज्यो॒तीर॑थः पवते रा॒य ओ॒क्य॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agrego rājāpyas taviṣyate vimāno ahnām bhuvaneṣv arpitaḥ | harir ghṛtasnuḥ sudṛśīko arṇavo jyotīrathaḥ pavate rāya okyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्रे॒ऽगः । राजा॑ । अप्यः॑ । त॒वि॒ष्य॒ते॒ । वि॒ऽमानः॑ । अह्ना॑म् । भुव॑नेषु । अर्पि॑तः । हरिः॑ । घृ॒तऽस्नुः॑ । सु॒ऽदृशी॑कः । अ॒र्ण॒वः । ज्यो॒तिःऽर॑थः । प॒व॒ते॒ । रा॒ये । ओ॒क्यः॑ ॥ ९.८६.४५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:45 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:20» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:45


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जो परमात्मा (अग्रेगः) सबसे पहले गति करनेवाला है, तथा (राजा) सबका स्वामी है और (अप्यः) सर्वगत है, (तविष्यते) वह स्तुति किया जाता है। (अह्नां विमानः) सूर्य-चन्द्रमादिकों का निर्माता है, (भुवनेष्वर्पितः) सब लोकों में स्थिर है और (हरिः) हरणशील है तथा (घृतस्नुः) प्रेम को चाहनेवाला है, तथा (सुदृशीकः) सुन्दर है। (अर्णवः) सुखों का समुद्र है (ज्योतीरथः) ज्योतिःस्वरूप है और (ओक्यः) सबका निवासस्थान है, वह परमात्मा (राये) ऐश्वर्य के लिये (पवते) हमें पवित्र करे ॥४५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वाधिकरणरूप से वर्णन किया है, जैसा कि “यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः” ऋ.।१०।१२ ६। में यही वर्णन किया है कि सर्व लोक-लोकान्तर उसी में निवास करते हैं ॥४५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अह्नां विमानः, ओक्यः

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्रेगो) = अग्रगति व उन्नतिवाला यह (राजा) = जीवन को दीप्त व व्यवस्थित करनेवाला [दीप्तौ], (अप्यः) = कर्मों में उत्तम सोम (तविष्यते) = स्तुति किया जाता है। यह (भुवनेषु अर्पितः) = शरीर के अंग-प्रत्यंगों में अर्पित हुआ हुआ (अह्नां विमान:) = दिनों का उत्तम निर्माण करता है, एक-एक दिन को सुन्दर बनाता है तथा हमारे जीवन के दिनों को बढ़ाता है । संक्षेप में यह सोम सुन्दर दीर्घजीवन का कारण बनता है । (हरिः) = यह दुःखों का हरण करनेवाला है । (घृतस्नुः) = ज्ञानदीप्ति को प्रसृत करनेवाला है, ज्ञान प्रवाह को प्रवाहित करनेवाला है। (सुदृशीकः) = उत्तमदर्शनीय है, इसके रक्षण से शरीर तेजस्वी व रम्य बनता है। (अर्णवः) = यह सोम ज्ञान जलवाला है, (ज्योतीरथ:) = ज्योतिर्मय रथवाला है, शरीररथ को ज्योतिर्मय बनाता है । यह राये सब अन्नमय आदि कोशों के ऐश्वर्य के लिये पवते प्राप्त होता है और (ओक्य:) = इस शरीर रूप गृह के लिये अत्यन्त हितकर है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम सुन्दर दीर्घ जीवन को प्राप्त कराता है। शरीर रूप गृह को बड़ा ठीक रखता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - यः परमात्मा (अग्रेगः) सर्वाग्रगामी तथा (राजा) सर्वस्य पतिः (अप्यः) सर्वगतश्चास्ति। (तविष्यते) स स्तूयते (अह्नां, विमानः) अपि च सूर्य्यचन्द्रादीनां निर्माता, (भुवनेषु, अर्पितः) सर्वलोकेषु स्थिरः (हरिः) हरणशीलः, तथा (घृतस्नुः) प्रेमाभिलाषी, तथा (सुदृशीकः) सुन्दरः, अपि च (अर्णवः) सुखसमुद्रः, अपरञ्च (ज्योतीरथः) ज्योतिस्वरूपः (ओक्यः) सर्वस्य निवासस्थानञ्चास्ति। स परमात्मा (राये) ऐश्वर्य्याय (पवते) मां पवित्रयतु ॥४५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, foremost pioneer spirit, refulgent ruler, open to all, maker of days and nights, omnipresent in all regions of the universe, is adored and worshipped by all. Soft and sweet, gracious and illuminative as ghrta, destroyer of darkness and suffering, blissful of sight, deep as space, riding the chariot of light, universal haven of all, moves, initiates and consecrates us for the achievement of honour, wealth and excellence.