पदार्थान्वयभाषाः - (हिरण्यपावाः) = [हिरण्यं वीर्यम्] सोमशक्ति का, वीर्य का अपने अन्दर पान करनेवाले लोग (अञ्जते) = इस शरीर के अंग-प्रत्यंग को शक्ति से अलंकृत करते हैं, (व्यञ्जते) = अपने हृदय को यज्ञिय भावनाओं से शुद्ध करते हैं । (समञ्जते) = ये अपने मस्तिष्क को ज्ञान से सजानेवाले होते हैं। (क्रतुं रिहन्ति) = ये हिरण्यपावा लोग 'शक्ति [kratas, power] यज्ञ व प्रज्ञान' का आस्वादन करते हैं । शरीर को शक्ति से, हृदय को यज्ञ से तथा मस्तिष्क को ज्ञान से अलंकृत करके ये लोग (मधुना अभ्यञ्जते) = माधुर्य से अपने सारे व्यवहार को अलंकृत करते हैं। सबके साथ अत्यन्त मधुरता से वरतते हैं। (आसु) = इन रेतकणों में, अर्थात् इन रेतकणों के सुरक्षित होने पर ये हिरण्यपावा लोग (पशुं गृभ्णते) = उस सर्वद्रष्टा प्रभु का ग्रहण करते हैं, जो प्रभु (उक्षणम्) = हमें शक्ति से सिक्त करते हैं तथा (सिन्धो:) = ज्ञाननदी के (उच्छ्वासे) = उच्छासित होने पर (पतयन्तम्) = हमें प्राप्त होते हैं। जितना- जितना ज्ञान बढ़ता है, उतना उतना प्रभु के हम समीप होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के द्वारा हमारा शरीर शक्ति से, हमारा मन यज्ञियभावना से तथा मस्तिष्क प्रज्ञान से सुभूषित होता है। इस सोमरक्षक पुरुष का व्यवहार माधुर्यपूर्ण होता है, और अन्ततः यह प्रभु को पाने का अधिकारी बनता है ।