वांछित मन्त्र चुनें

स भ॒न्दना॒ उदि॑यर्ति प्र॒जाव॑तीर्वि॒श्वायु॒र्विश्वा॑: सु॒भरा॒ अह॑र्दिवि । ब्रह्म॑ प्र॒जाव॑द्र॒यिमश्व॑पस्त्यं पी॒त इ॑न्द॒विन्द्र॑म॒स्मभ्यं॑ याचतात् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa bhandanā ud iyarti prajāvatīr viśvāyur viśvāḥ subharā ahardivi | brahma prajāvad rayim aśvapastyam pīta indav indram asmabhyaṁ yācatāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । भ॒न्दनाः॑ । उत् । इ॒य॒र्ति॒ । प्र॒जाऽव॑तीः । वि॒श्वऽआ॑युः । विश्वाः॑ । सु॒ऽभराः॑ । अहः॑ऽदिवि । ब्रह्म॑ । प्र॒जाऽव॑त् । र॒यिम् । अश्व॑ऽपस्त्यम् । पी॒तः । इ॒न्दो॒ इति॑ । इन्द्र॑म् । अ॒स्मभ्य॑म् । या॒च॒ता॒त् ॥ ९.८६.४१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:41 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:41


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) पूर्वोक्त कर्मयोगी (भन्दनाः) वन्दना (उदियर्ति) करता है, जो वन्दना (अहदिर्वि) सर्वदा (प्रजावतीः) शुभप्रजा को देनेवाली है तथा (विश्वायुः) सम्पूर्ण आयु को देनेवाली है और (विश्वाः) सब प्रकार की (सुभराः) पूर्तियों की करनेवाली है। (ब्रह्म) वेद (प्रजावत्) जो सदुपदेश द्वारा शुभप्रजाओं को देनेवाला है और (रयिं) धन और (अश्वपस्त्यं) अन्य गतिशील पदार्थों को देनेवाला है। (पीतः) नित्यतृप्त (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! आप (इन्द्रं) कर्मयोगी को तथा (अस्मभ्यं) हमारे लिये उक्त ऐश्वर्य (याचतात्) दें ॥४१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में ऐश्वर्य्य की प्रार्थना करते हुए वेदों के सदुपदेशरूपी महत्त्व का वर्णन किया है ॥४१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्म प्रजावत्, रयिम् अश्वपस्त्यम्

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) = वह (विश्वायुः) = पूर्ण जीवन को प्राप्त करानेवाला सोम (अहर्दिवि) = दिन-रात (विश्वा:) = सब (सुभरा:) = उत्तम भरण की साधन भूत (प्रजावती:) = प्रकृष्ट विकासवाली (भन्दना) = स्तुतियों को (उदियर्ति) = उत्कर्षेण प्रेरित करता है । सोमरक्षण से हमारी वृत्ति प्रभुस्तवन की होती है। यह प्रभुस्तवन हमारे पूर्ण जीवन का कारण होता है, अंग-प्रत्यंग का उत्तम पोषण करनेवाला होता है और सब शक्तियों को विकसित करता है । हे (इन्दो) = सोम ! (पीतः) = शरीर के अन्दर पिया हुआ तू (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (इन्द्रम्) = उस परमैश्वर्यशाली प्रभु से (ब्रह्म) = उस ज्ञान की (याचतात्) = याचना कर जो (प्रजावत्) = हमारे प्रकृष्ट विकास का कारण बने, तथा (रयिम्) = हमारे लिये धन की याचना कर जो (अश्वपस्त्यम्) = उत्तम अश्वों से युक्त गृहवाला हो । यहाँ 'गृह' यह शरीर है, 'अश्व' इन्द्रियाँ हैं धन वही ठीक है जो इस शरीर व इन्द्रियों को ठीक बनाये रखे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम जीवन को स्तुतिमय बनाता है। यह ज्ञान व धन की प्राप्ति का साधन बनता है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) पूर्वोक्तः कर्म्मयोगी (भन्दनाः) वन्दनां (उत्, इयर्ति) करोति। या वन्दना (अहर्दिवि) सन्ततं (प्रजावतीः) शुभप्रजादायिका तथा (विश्वायुः) अखिलायुर्दायिका। अपरञ्च (विश्वाः) सर्वप्रकारायाः (सुभराः) पूर्तेः कारिका चास्ति। (ब्रह्म) वेदः (प्रजावत्) यः सदुपदेशैः शुभप्रजाः अपि च (रयिं) धनं (अश्वपस्त्यं)   अन्यगतिशीलपदार्थांश्च ददाति। (पीतः) सतततृप्तस्त्वं (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूपपरमात्मन् ! (इन्द्रं) कर्म्मयोगिनं तथा (अस्मभ्यं) मह्यं उक्तैश्वर्य्यं (याचतात्) देहि  ॥४१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - It raises sun rays and moves our thanks and adorations which bring up noble progeny, all health and long age and abundant fulfilment of universal value day and night. Indu, Spirit of light and joy of life, sung and celebrated, give us the knowledge of divinity, wealth of noble progeny, a home full of comfort and achievement, and power and excellence of the world.