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उन्मध्व॑ ऊ॒र्मिर्व॒नना॑ अतिष्ठिपद॒पो वसा॑नो महि॒षो वि गा॑हते । राजा॑ प॒वित्र॑रथो॒ वाज॒मारु॑हत्स॒हस्र॑भृष्टिर्जयति॒ श्रवो॑ बृ॒हत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

un madhva ūrmir vananā atiṣṭhipad apo vasāno mahiṣo vi gāhate | rājā pavitraratho vājam āruhat sahasrabhṛṣṭir jayati śravo bṛhat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत् । मध्वः॑ । ऊ॒र्मिः । व॒ननाः॑ । अ॒ति॒स्थि॒प॒त् । अ॒पः । वसा॑नः । म॒हि॒षः । वि । गा॒ह॒ते॒ । राजा॑ । प॒वित्र॑ऽरथः । वाज॑म् । आ । अ॒रु॒ह॒त् । स॒हस्र॑ऽभृष्टिः । ज॒य॒ति॒ । श्रवः॑ । बृ॒हत् ॥ ९.८६.४०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:40 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:40


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मध्वः) मीठी (ऊर्मिर्वननाः) लहरोंवाली वेदवाणी (उदतिष्ठिपत्) तुम आश्रय किये हो तथा (राजा) तुम सबको प्रकाश देनेवाले हो और (पवित्ररथः) आप पवित्रगतिवाले हो तथा (वाजमारुहत्) ऐश्वर्यरूपी शक्ति को आश्रय किये हुए हो और (सहस्रभृष्टिः) अनन्तशक्तियों से इस संसार को पालन करनेवाले हो तथा (बृहच्छ्रवः) बड़े यशवाले हो और (जयति) सर्वोत्कृष्टता से वर्तमान हो। उक्तगुणसम्पन्न आपको (अपो वसानः) कर्म्मयोगी (महिषः) महापुरुष (विगाहते) साक्षात्कार करता है ॥४०॥
भावार्थभाषाः - महिष शब्द के अर्थ यहाँ महापुरुष के हैं। “महिष इति महन्नामसु पठितम्।” नि. अ.।३। खं. १३ ॥ महिष यह निरुक्त में महत्त्व का वाचक है। महापुरुष यहाँ कर्मयोगी और ज्ञानयोगी को माना है। उक्त पुरुषों में महत्त्व परमात्मा के सद्गुणों के धारण करने से आता है, इसीलिये इनको महापुरुष कहा है ॥४०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ज्ञानी कर्मनिष्ठ उपासक' बनानेवाला सोम

पदार्थान्वयभाषाः - (मध्वः ऊर्मिः) = माधुर्य की तरंगरूप यह सोम (वनना:) = सेवनीय ज्ञान की वाणियों को (उद् अतिष्ठिपत्) = हमारे में स्थापित करता है। हमें तीव्र बुद्धि बनाकर ज्ञान को प्राप्त कराता है। (अपः वसानः) = कर्मों को धारण करता हुआ हमें क्रियाशील बनाता हुआ (महिषः) = यह उपासनावाला सोम (विगाहते) = शरीर कलश में प्रवेश करता है। सोम रक्षित हुआ हुआ हमें प्रभु की ओर झुकाता है । (राजा) = हमारे जीवनों को व्यवस्थित व दीप्त करनेवाला [regulate दीसौ] (पवित्रस्थ:) = शरीरस्थ को पवित्र बनानेवाला सोम (वाजं आरुहत्) = संग्राम में आरूढ़ होता है। शरीर में प्रविष्ट होकर यह रोगकृमियों व वासनाओं से संग्राम को प्रारम्भ करता है । वहाँ (सहस्त्रभृष्टिः) = शतसः मनुष्यों को भून डालनेवाला यह सोम (बृहत् श्रवः) = महान् यज्ञ का (जयति) = विजय करता है । सब शत्रुओं को शीर्ण करके विजयी होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'ज्ञानी कर्मनिष्ठ उपासक' बनाता है। शत्रुओं का शीर्ण करके हमारे जीवन को यशस्वी करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मध्वः) मधुरां (ऊर्मिः, वननाः) तरङ्गवतीं वेदवाणीं (उत्, अतिष्ठिपत्) त्वमाश्रयसि। तथा (राजा) त्वं सर्वप्रकाशकः (पवित्ररथः) पवित्रगतिमाँश्चासि। तथा (वाजम्, आ, अरुहत्) ऐश्वर्य्यशक्तिमाश्रयसि। अपि च (सहस्रभृष्टिः) अनन्तशक्तिभिरस्य संसारस्य पालनं करोषि। तथा (बृहत्, श्रवः) महाशक्तिमानसि। अपरञ्च (जयति) सर्वोत्कृष्टत्वेन वर्तसे ! उक्तगुणसम्पन्नस्त्वां (अपः, वसानः) कर्मयोगी (महिषः) महापुरुषः (वि, गाहते) साक्षात्करोति ॥४०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma of honey sweets of divinity helps desires to be stabilised. The great ardent one wearing the cloak of dynamics of creativity sojourns over spaces. Refulgent ruler riding the purity chariot advances to victory in elemental evolution and, wielding a thousand arms of blazing light, wins high and imperishable renown and adoration.